सतत चलना बड़ा मुश्किल,

 "यथार्थ सुख "


सतत चलना बड़ा मुश्किल, 

            जहां के साथ होकर के ।

चलो चलकर अकेले ही, 

            मुश्किलें आसां करते हैं ।

कि बन नदिया निरन्तर बह, 

           खोज सागर की करते हैं ।

कभी बन सूर्य की लाली, 

            तमस को भेद देते हैं ।

कि बन झर-झर के झरने से, 

             भिदन पाषाण का कर दें  ।

मधुर वंशी की धुन में मिल, 

               मधुर रस घोल देते हैं ।

कुहू कू - कू की कोयल में, 

               स्त्रवन श्रृंगार बनते हैं ।

भले गमगीन हों लेकिन, 

            अधर मुस्कान बनते हैं ।

चलो चलकर अकेले ही, 

            मुश्किलें आसां करते हैं ।

सतत चलना बड़ा मुश्किल ,

           जहां के साथ होकर के ।

मुकद्दर भी बदल दें हम,

        चलो मिल कर्म को करके ।

कि मन का मन्थन करके ही, 

        प्रेम की कविता गढ़ते हैं ।

कभी बन रूप शक्ति का,

           हनन दुर्जन का करते हैं ।

चलो चलकर अकेले ही, 

           मुश्किलें आसां करते हैं ।

रश्मि पाण्डेय, 

बिन्दकी, फतेहपुर

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