नजरें इनायत गुरु पूर्णिमा कार्यक्रम, जयपुर में तीन दिवसीय आध्यात्मिक सतसंग व नामदान की बरसात

 नजरें इनायत गुरु पूर्णिमा कार्यक्रम, जयपुर में तीन दिवसीय आध्यात्मिक सतसंग व नामदान की बरसात



सच्चे सन्त का सतसंग न मिलने से लोगों को पता ही नहीं चलता कि ये अनमोल नर नारायणी मनुष्य शरीर क्यों मिला


भोजन और आराम जैसे जरूरी चीजें के समान ही मौत को याद रखो


जयपुर (राजस्थान)।नरकों और चौरासी लाख योनियों की पीड़ा से बचाने वाले, अपने आध्यात्मिक सतसंग में देव दुर्लभ मनुष्य शरीर मिलने का मूल उद्देश्य बताने वाले, मौत की याद दिला कर मानव को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देने वाले, हर सांस की कीमत लगा जीते जी प्रभु की प्राप्ति करवाने वाले वर्तमान के सन्त सतगुरु दुःखहर्ता त्रिकालदर्शी परम दयालु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने नजरें इनायत गुरु पूर्णिमा कार्यक्रम के प्रथम दिन 11 जुलाई 2022 प्रातः काल को जयपुर में आये भक्तों को दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि यही जीवात्मा सबके अंदर है चाहे वह देवलोक में, असुरलोक, भूलोक कहीं भी हो, कीड़े, मकोड़े, सांप, गोजर आदि सबके अंदर है। चौरासी में सजा भोगने के लिए डाल दिया गया है।


*जिनको सच्चे सन्त का सतसंग नहीं मिलता उनको मालूम ही नहीं हो पाता कि देव दुर्लभ शरीर क्यों मिला है*


न जानकारी में तमाम तकलीफों का पहाड़ ही इस समय पर लोगों के सामने खड़ा हो गया, लोग सजा भोगते रहते हैं। इसीलिए कहा जाता है सतसंग सुनो तब यह तकलीफ जाएंगी। बिना सतसंग, भजन के ये कलेश, तकलीफें नहीं जाएंगी और जीवन का समय निकल जाएगा। पैदाइश के अनुसार लोगों के अंदर धार्मिकता आती है। जहां धार्मिकता ही नहीं, सतसंग मिलता ही नहीं, संतों का आगमन नहीं हो पाता, वहां गांव, समाज, घर के लोगों का उसी तरह से जीवन हो जाता है। मनुष्य इस चीज को नहीं समझ पाता है कि यह नर नारायणी देव दुर्लभ शरीर है, देवताओं को भी जल्दी नहीं मिलता है, यह किस काम के लिए मिला है समय उसका निकलता चला जाता है क्योंकि बहुत से लोगों को यह भी नहीं मालूम है, याद नहीं है कि एक दिन इसको खाली करना पड़ेगा।


*जैसे जरूरी चीजें याद रखते हो भोजन और आराम ऐसे ही मौत को याद रखो*


जरूरी चीजें याद रखनी पड़ती हैं जैसे भोजन, आराम, बच्चे को सुबह स्कूल भेजना, फीस जमा करना, टाइम से बिजली का बिल जमा करना नहीं तो जुर्माना देना पड़ेगा। ऐसे ही मौत को याद रखना चाहिए। यह नहीं समझना चाहिए कि जो जीवन का समय मिला है केवल जीने के लिए ही मिला है। समझो कि किस काम के लिए मिला है। इसके लिए देवता तरसते रहते हैं तो आप समय की कीमत लगाओ। जो कीमत नहीं लगाता है उसके ग्राहक निकल जाते हैं।


*जैसे समय से दुकान न खोलने पर ग्राहक निकल जाता है ऐसे ही एक-एक दिन सांसो की पूंजी निकलती जा रही है*


दुकान 10 की बजाय 12 बजे खोली तो ग्राहक दूसरी जगह से सामान खरीद लेगा। दफ्तर में 10 बजे के बजाय 11 बजे जाओगे तो गैर हाजरी लग जाएगी। इस तरह जैसे समय का ध्यान रखते हो ऐसे ही अपने जीवन के समय का ध्यान रखो की निकलते एक-एक दिन सांसो को खत्म कर दे रहे हैं, समय हमारा माया के बाजार में बर्बाद हो रहा है। ये बाजार लगा रखा है कि जीव उसमें फंस जाए।


*दृष्टांत कहानी आध्यात्मिक लाइन का एक तरह से बचपना है*


महात्माओं दृष्टांत कहानी सुना कर के जीवों को समझाते रिझाते हैं। जैसे बच्चे को कहानी सुना के उससे गिनती सिखाते हो, प्रार्थना याद करवाते हो तो ये भी एक तरह से ये आध्यात्मिक लाइन का एक तरह से बचपना है। सन्त किसी भी तरह से जीवों को सुना समझा कर रिझाते हैं, अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। जैसे मां-बाप टीचर बच्चों को पढ़ाने के लिए प्यार देते हैं उसी तरह सन्त भी जीवों को प्यार देते हैं कि हम से इनका जुड़ाव लगाव बढ़े। लोगों की तकलीफ कष्ट जब दूर होती हैं तब वह समझने की कोशिश करते हैं। फिर उनके मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

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