इतिहास के पन्नों से... (कल और आज)

 इतिहास के पन्नों से... (कल और आज)



जहाँ तालाब में बैठी है माता गँगा, एक अलौकिक सिद्धपीठ की अजब कहानी....


1730 में मिट्ठू लाल की तीसरी पीढ़ी के समय हुईं थी ऐतिहासिक श्रीबाँके बिहारी जी विराजमान मंदिर की स्थापना


परोपकारी बेटे शिव अंबर लाल के साथ मेहरबान सिंह ने स्थापित कराई थी बाँकेबिहारी व राधारानी की अष्टधातु की मूर्तियाँ


रईस खानदान की पांचवी पीढ़ी के समय स्थापित हुईं थीं राम, सीता व लक्ष्मण की अष्टधातु मूर्तियाँ


अवैध कब्जो से बचाने के लिए 1995 में अंतिम महंत रामचंद्र दास ने सरकार के नाम कर दी थी ट्रस्ट डीड


1970 के बाद इतिहास बन गई पालकी परम्परा, अन्तिम वारिस प्रदीप श्रीवास्तव के जेहन में अभी भी ताजा हैं यादगार लम्हें


मन्दिर का कायाकल्प कराने को तत्कालीन डीएम आञ्जनेय कुमार सिंह की भूमिका रही है महत्वपूर्ण


फतेहपुर। कहते हैं इतिहास अपने पीछे तमाम किवदंतियां छोड जाता है, समय के साथ भाव और उद्देश्यों में परिवर्तन आम बात है किन्तु आस्था का स्थान सर्वोपरि है। फतेहपुर का ऐतिहासिक श्रीबाँके बिहारी जी विराजमान मन्दिर भी अपने गर्भ में अभी भी तमाम रहस्य छिपाए हैं। उत्तर भारत के सिद्धपीठों का जब-जब इतिहास लिखा जायेगा तो इस मन्दिर को शामिल करना इतिहासकारों की विवशता होगी। यह अलग बात है कि तकरीबन तीन सौ वर्ष पुराने इस देव स्थान के महात्म के साथ इतिहासकारों ने अब तक न्याय नहीं किया है और आध्यात्मिक स्थलों की फेहरिस्त में अपेक्षित स्थान भी नहीं मिला। फिर भी इस सिद्धपीठ की प्रासंगिकता किसी परिचय को मोहताज नहीं है। निःसंदेह पिछले कुछ दशक इस मंदिर की ख्याति पर बट्टा लगाने वाले रहे और कुत्सित मानसिकता वाले ग्रहण बने किंतु तकरीबन तीन वर्ष पूर्व फतेहपुर के तत्कालीन डीएम आँजनेय कुमार सिंह ने न सिर्फ इसके महत्व को समझा, बल्कि इसे राष्ट्रीय पटल पर स्थापित कराने का बीड़ा उठाते हुए इसके कायाकल्प का महामिशन शुरू किया। बगैर किसी सरकारी धन का प्रयोग किये गैर प्रशासनिक स्रोतों और स्वयं तथा जनमानस के सहयोग से करोड़ों की लागत से इसको भव्य स्वरुप देने की जो शुरुआत की वह क्रम अभी भी जारी है किन्तु हाल के माहों में इसके निर्माण की गति कुछ मंद अवश्य पड़ी है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है। बावजूद इसके यहाँ से जाने के बाद भी आँजनेय का इस मंदिर को लेकर भाव कम नहीं हुआ है।

इतिहास पर गौर करें तो जनपद के जानें मानें रईस बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव के खानदान की आन बान शान से इस मंदिर का गहरा जुड़ाव रहा है। कहते हैं कि सन 1600 के आसपास इस खानदान के मिट्ठू लाल श्रीवास्तव के आध्यात्मिक लगाव के चलते उनकी पत्नी सुनैना देवी ने फतेहपुर में एक भव्य मंदिर की स्थापना का संकल्प लिया, किन्तु उनके खानदानी पुरोहित ने सूर्य के साथ जोड़कर 100 साल बाद ही मन्दिर की स्थापना के लिए उचित समय बताया। कहते हैं मिट्ठू ने अपने अंतिम समय अपने बेटे संतोष रॉय को इसकी जिम्मेंदारी सौंपी किन्तु उनके जीवन में भी समय और संजोग न बन पाने के कारण उन्होंने अपने बेटे मेहरबान सिंह को मन्दिर की स्थापना की जिम्मेवारी सौपते हुए देह त्याग दिया।

1730 में रोहणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन मेहरबान सिंह ने अपने महाप्रतापी पुत्र शिव अम्बर लाल के सहयोग और बंधु-बांधवो के साथ चैमासी व्रत पूजा संकल्प और महाआयोजन के साथ इस मन्दिर की स्थापना कराई। कहते हैं कि मन्दिर स्थापना के दो-ढाई मास पहले से लगभग दो मास बाद तक यहां उत्सव मनाया गया था। उसी समय से पालकी परंपरा के पड़ने का हवाला मिलता है, जो सदियों चलती रहीं। बाद में इस बड़े घराने के बाबू खुशवक्त रॉय और फिर उनके पुत्र रईस बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव (तीन दशक तक म्युनिसिपैलिटी के चेयरमैन रहे) व कामता प्रसाद श्रीवास्तव (मजिस्ट्रेट प्रथम) ने जीवन पर्यंत इस मन्दिर से अपना जुड़ाव बरकरार रखते हुए अपने पूर्वजों की धरोहर को आन बान शान से जोडे़ रखा।

मौजूदा समय में इस खानदान के एकलौते वारिस पूर्व पुलिस महानिदेशक चंडीगढ़ प्रदीप श्रीवास्तव (पुत्र सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव) बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना के समय इसका परिक्षेत्र 14 बीघे 07 बिस्वा का था। यह जमीन उनके पूर्वजों ने मंदिर को दान दी थी। प्रारम्भ में ज्वालागंज से मंदिर तक 11 मीटर चैड़ी अलग से पगडंडी थी जिसका जिक्र मंदिर के पुराने नक्शे में भी मिलता है। कभी इस पगडंडी से मंदिर तक भव्य मेला भी लगता था और यहाँ की रामलीला की ख्याति दूर-दूर तक थी। इस देव स्थान की स्थापना के बाद से अनवरत (प्रत्येक वर्ष) जन्माष्टमी के दिन मन्दिर परिसर से बाके बिहारी की भव्य पालकी निकलती थीं, जिसमें हाथी-घोड़े भी शामिल होते थे। यह पालकी सर्वप्रथम उनके चंदियाना (फतेहपुर) स्थित पैतृक घर पहुंचती थी, वहां पर परंपरागत ढंग से परिवार के लोग बांके बिहारी जी की आरती-पूजा अर्चना करते थे, तत्पश्चात तमाम भक्तों की मौजूदगी व उत्सव पूर्ण माहौल में पालकी चैक-ठठराही जाती थी, वहां पर आरती आदि के बाद वापस मन्दिर में सम्पन्न हो जाती थी किन्तु उस दिन देर रात तक मन्दिर में आध्यात्मिक कार्यक्रम होते रहते थे। बकौल प्रदीप श्रीवास्तव 1970 तक पालकी परंपरा का बरकरार रहना उनकी याददाश्त में है, उसके बाद सब कुछ बदलते समय की भेंट चढ़ गया। बताते है कि मन्दिर की स्थापना के लगभग 30 वर्ष तक इस मन्दिर की देखरेख व पूजा अर्चना परिवार के लोग ही करते थे।

उल्लेखनीय है कि इस मन्दिर की स्थापना के समय ही बाँके बिहारी (कृष्ण) के साथ-साथ राधारानी की अष्टधातु की मूर्तियाँ स्थापित कराई गई थी। वहीं 1760 के करीब लगभग पाँच वर्ष की आयु में एक घुमन्तू बालक के रुप में श्रीश्री 108 महंत नारायणदास जी महाराज के मन्दिर से जुड़ने का हवाला मिलता है। नारायणदास जी के बारे में कहा जाता है कि वह अनवरत लगभग 80 वर्षों तक रोजाना सुबह सूरज की पौ फटने से पहले पतित पावनी उत्तर वाहिनी गंगा के भिटौरा तट से गंगाजल लेकर बाँकेबिहारी को स्नान कराते थे, उनके आने जानें में बमुश्किल आधा घण्टे का समय लगता था, किन्तु ऐसी किवदंती है कि महंत जी रोजाना कब मन्दिर से गंगा जल लेने जाते थे, यह कभी कोई नहीं देख पाया।। यह भी कहा जाता है कि महंत नारायण दास के लगभग अंतिम समय उन्होंने माता गंगा का आह्वाहन कर गंगा को कमंडल में भरकर मन्दिर परिसर में बने ताल में बैठा दिया। ऐसी मान्यता है कि तब से गंगा जी इस तालाब में बैठी हैं। इस अलौकिक तालाब का जल कभी समाप्त नहीं होता। इस तालाब को तीज तालाब के नाम से भी जाना जाता है। सदियों से अपने पति की लम्बी आयु के लिये तीजा का वृत रखने वाली सुहागिने अगले दिन सुबह इस तालाब में गौरा-पार्वती की मूर्तियाँ विसर्जित करने के बाद अपना व्रत समाप्त करती है। इस दिन यहाँ बड़ा मेला भी लगता है।

बताते चले कि इस मंदिर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण की अष्टधातु की मूर्तियाँ भी इसी परिवार के द्वारा स्थापित करवाए जानें की बात कहीं जाती हैं। इस देव स्थान पर अंग्रेजी अफसरो के भी माथा टेकने की बात कहीं जाती रही हैं।बताया जाता है कि अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण हालत में श्रीश्री 108 महंत नारायणदास जी महाराज ने 1866 में 111 वर्ष की आयु में यहीं पर जीवित समाधि ले ली थी। इसके बाद उनके शिष्य राम कुमार दास यहां के महंत हुए, जो 1951 तक यहाँ के महंत रहे। उनके बाद उनके शिष्य गणेश दास जी महाराज यहाँ के महंत बने, जिन्होंने 25 अप्रैल 1995 को तत्कालीन जिला अधिकारी डा. प्रभात कुमार को ट्रस्ट डीड करके मंदिर की समूची चल व अचल सम्पत्ति सरकार को सौंप दी। इस सिद्धपीठ के अंतिम महंत गणेश दास जी महाराज की 2005 में मौत के बाद मन्दिर का समूचा भू-भाग और सम्पत्ति विशुद्ध रूप से सरकार की सम्पत्ति हो गई है, जिसकी देखरेख का जिम्मा जिलाधिकारी के नेतृत्व (अध्यक्षता) वाली सरकारी समिति करती है। इस समिति का पदेन मैनेजर तहसीलदार सदर होता है।

मिट्ठू लाल खानदान के फिलहाल एकलौते वारिस यू0टी0 कैडर के आईपीएस प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं कि यह मन्दिर हमारे खानदान की धरोहर है, जिसके साथ तमाम यादें जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन को इस मन्दिर और उससे जुड़े परिसर की सुरक्षा करना चाहिए। उन्होंने एक सवाल के जवाब में यह भी कहा कि यह ऐतिहासिक सिद्ध पीठ है जो विशुद्ध रूप से सरकार के अधीन है, इस पर किसी भी प्रकार का दावा या विवाद अनुचित है। उन्होंने तत्कालीन डीएम आञ्जनेय कुमार सिंह को विलक्षण प्रतिभा का व्यक्ति बताया और कहा कि उन्होंने इस मन्दिर के बारे में जो किया वह इस जनपद के लोगों को लम्बे समय तक याद रहेगा। उन्होंने बताया कि कु0 कमला लाइब्रेरी जिम्नेशियम को लेकर जब उनसे मुलाकात हुई थी तो उन्हें धन्यवाद देते हुए आभार जताया था। वह निकट भविष्य में जब भी फतेहपुर आयेंगे डीएम से बांके बिहारी जी महाराज के मन्दिर के बारे में वार्ता करेगें।

तीन धन्नियो की अजब कहानीः महंत नारायणदास कुटी बाँके बिहारी मंदिर का एक वाकया लम्बे समय तक चर्चा में रहा। ये उन दिनो की बात है जब शिष्यों और भक्तों के लिये मंदिर परिसर में अतिरिक्त कमरों का निर्माण हो रहा था। कही से 54 धन्निया पाटने के लिये मँगाई गई थी जिनमें तीन छोटी पड़ गई जिससे काम रुक गया। बात महंत नारायण दास तक पहुँची तो वे उस स्थान पर पहुँचे और तीनो धन्नियो से कहा कि ऐसा न करो कि तुम थोड़ा बड़ी हो जाओ, कहते है धन्नियो ने महंत जी का आदेश मान लिया और जब काम कर रहे लोगों ने धन्नियो को बयालो मे रखा तो वह भी अन्य धन्नियो के बराबर मिली। इस चमत्कार को देखने जनपद की ख्याति लब्ध हस्ती जोधा सिंह अटैया भी आये थे और महंत जी से आशीर्वाद लिया। बाद में 1857 की गदर में जोधा सिंह अटैया अपने साथियों के साथ भी कुछ समय के लिये यहाँ शरण ली थी। पिछले दिनो जब पुनरोद्धार के लिये इस मंदिर का पुराना भवन ढहाया गया तो कुछ लोग अन्य सामान के साथ सारी धन्निया भी उठा ले गए, जिनमे उन तीनो के भी होने की बात कही जाती है और 07 घण्टे हवा में टँगी रही इमली की टूटी डालः महंत नारायणदास कुटी का एक और वाकया लम्बे समय तक चर्चा में रहा। बताते है कि महंत नारायण दास प्रत्येक वर्ष मंदिर में भव्य रामलीला का मंचन करवाते थे। 1790 में मंदिर परिसर में रामलीला चल रही थी। जैसे ही परशुराम-लक्ष्मण संवाद शुरू हुआ आँधी-तूफान ने आयोजन में विघ्न डाला। कुछ देर बाद जब तूफान थमा तो मंचन फिर से शुरू हुआ। जहाँ पर मंचन हो रहा था वहाँ एक पुराना इमली का पेड़ था। महंत जी ने देखा की पेड़ की एक बड़ी डाल फटकर नीचे गिर रही है। उन्होंने डाल को हवा में ही रोक दिया और जब रामलीला समाप्त हो गई तब ही वह डाल नीचे गिरी।

कई रंग बदलता है नार्मदेश्वर मंदिर का शिवलिंगः बाँके बिहारी मंदिर की स्थापना के कुछ समय बाद शिव अम्बर लाल ने इसी मंदिर परिसर में बाबा नार्मदेश्वर मंदिर की भी स्थापना की थी। नार्मदेश्वर शिवलिंग की चर्चाए दूर-दूर तक आज भी होती है। कहते है इस शिवलिंग में रुद्राभिषेक गंगाजल और गन्ने के रस से करने पर यह अलौकिक शिवलिंग कई रंग बदलता है। खासकर श्रावण मास में यहाँ रुद्राभिषेक का विशेष महात्म है।

खतरे से खाली नहीं है मंदिर में जोड़े के साथ रात्रि प्रवासः जानकार बताते है कि महंत नारायणदास ने एक घटना से क्षुब्ध होकर पति-पत्नी के भी रात्रि समय मंदिर परिसर में प्रवास (रुकने) पर रोक लगा दी थी। महंत द्वारा जोड़े के रुकने पर प्रतिबंध लगाये जाने के बाद कुछ दशक पहले तक यहाँ जोड़ो का रुकना पाप माना जाता था किंतु जैसे-जैसे सोच बदली जोड़े रुकने तो लगे किंतु हमेशा अनहोनी की संभावनायें बनी रही।

 बड़ी अजब है बाँकेबिहारी की बांई भुजा का रहस्यः इस अलौकिक मंदिर से जुड़ी एक और प्राचीन कहानी काफी चर्चित है। कहते है कि एक बार चोर मंदिर के अंदर से बाँके बिहारी की अष्टधातु की मूर्ति चुरा ले गये। सुबह जब नारायण दास को उनके आराध्य देव की मूर्ति के चोरी होने की खबर लगी तो गम में उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया। 17 दिनो तक चोर मूर्ति लेकर इधर उधर घूमते रहे। यहाँ तक कि मूर्ति की बांई भुजा भी काट डाली। फिर भी किसी भी स्वर्णकार ने मूर्ति को हाथ तक नहीं लगाया। थक-हारकर चोर मूर्ति व कटी भुजा को मंदिर परिसर में बने तीज तालाब में फेंककर भाग गये। तब महंत जी को स्वप्न आया कि तुम सो रहे हो और मै तालाब में दस कदम उत्तर दिशा में पड़ा हूँ। महंत जी कड़ाके की सर्द रात में उठे और स्वप्न में बताये स्थान पर पहुंचे तो उन्हें मूर्ति मिल गईं किंतु मूर्ति की भुजा कटी देखकर अत्यंत दुखी हुए और इसका गुनहगार अपने को मानते हुए देह त्यागने का मन बनाने लगे। कहते हैं कि अगली रात उन्हें फिर स्वप्न आया कि तालाब में दस कदम दक्षिण की ओर मेरी भुजा पड़ी है। तब उन्हें कटी हुई भुजा भी मिल गई। बाद में महंत जी के अनुरोध पर उस समय के एक चर्चित स्वर्णकार ने मूर्ति से कटी हुई भुजा को जोड दिया। मूर्ति की जुड़ी हुई भुजा आज भी स्पष्ट देखी जा सकती है।

रहस्यो के घेरे में त्रिस्तरीय संरक्षक व संचालन समिति को गोपनीय रखनाः फतेहपुर में अपनी तैनाती के दौरान डीएम आञ्जनेय कुमार सिंह की मौजूदगी में एक महत्वपूर्ण बैठक होने की बात कही जाती है। जिसमें त्रिस्तरीय व्यवस्था के तहत इस मंदिर को आकर्षक स्वरुप देने के साथ ही इसे बतौर आध्यात्मिक स्थल के साथ-साथ पर्यटक स्थल बनाने की भी रणनीति को अंतिम रूप दिया गया था। इसमें महंत नारायण दास कुटी बाँकेबिहारी विराजमान मंदिर के रखरखाव व अन्य व्यवस्था हेतु संरक्षक मंडल का गठन किया गया। जिसमें जिला अधिकारी समेत पुलिस कप्तान, अपर जिला अधिकारी, अपर पुलिस अधीक्षक को शामिल किया। इसके अतिरिक्त प्रबन्ध समिति बनायी गयी जिसमें उप जिलाधिकारी, तहसीलदार, उप पुलिस अधीक्षक, अधिशासी अधिकारी नगर पालिका परिषद को सम्मिलित किया गया। यही नहीं मंदिर की व्यवस्था के लिये जनप्रतिनिधियो की भी एक समिति बनाई गई। जिसमें सांसद, सदर विधायक, नगर पालिका चेयरमैन शामिल किये गये। इससे पहले कि ये तीनो समितियों की सूची सार्वजनिक होती डीएम आञ्जनेय का यहाँ से तबादला हो गया, जिसके बाद यह सूची डीएम के स्टेनो लल्लू राम तक सीमित रही। इन समितियों की सूची अब तक सार्वजनिक न होने से अभी भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

सरकारी दस्तावेजो में कहाँ है मंदिर और क्या है नामः बाँके बिहारी विराजमान मंदिर की 14 बीघे 07 बिस्वा जमीन जो मौके पर लगभग 11 बीघे ही बची है। वह सरकारी दस्तावेजो में उत्तरी कस्बा फतेहपुर (शहर का ज्वालागंज इलाका) में दर्ज है, जिसके लगभग चार बीघे में अभी भी अवैध कब्जा है। यहाँ तक कि अति प्राचीन कुँआ किसी के घर के अंदर पहुँच गया है। इस मंदिर का वास्तविक दस्तावेजी नाम श्रीबिहारी जी महाराज विराजमान मंदिर नारायण दास कुटी है।पर्यटन स्थल बनाने को पर्यटन मंत्री रीता बहुगुणा जोशी से मिले थे आञ्जनेयः बांके बिहारी जी विराजमान मन्दिर को पर्यटक स्थल बनाने के लिए तत्कालीन डीएम आञ्जनेय कुमार सिंह ने प्रदेश की तत्कालीन पर्यटन मंत्री रीता बहुगुणा जोशी से उनके आवास में मिलकर चर्चा की थी, जिसपर 08 करोड रूपए देने का आश्वासन भी दिया था, किन्तु आञ्जनेय के तबादले के बाद स्टीमेट न पहुंच पाने के कारण यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

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