कलयुग जब जाने लगेगा तो बहुतों का सफाया होगा; आप सन्त के बंदे हो, लोगों को बचाने की जरूरत है

 कलयुग जब जाने लगेगा तो बहुतों का सफाया होगा; आप सन्त के बंदे हो, लोगों को बचाने की जरूरत है


गुरु की मौज के अनुसार काम कर भक्त, गुरु का प्यारा बन जाता है


चाहे धरती फटने, सूखा-बाढ़, अकाल-भुखमरी, लड़ाई-झगड़ा, एटम-परमाणु बम से हो, खत्म तो होना ही होना है


उज्जैन


(मध्य प्रदेश)।इसी कलयुग में कलयुग जाने और सतयुग आने की भविष्यवाणी करने वाले विश्वविख्यात बाबा जयगुरुदेव के उत्तराधिकारी, आने वाले खराब समय लोगों की जान बचाने में लगे, अपने प्रेमियों, भक्तों को भी वैचारिक क्रांति से लोगों को शाकाहारी सदाचारी नशामुक्त बनाने की प्रेरणा देने वाले वर्तमान के पूरे समर्थ त्रिकालदर्शी अंतरयामी सन्त सतगुरु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी ने तपस्वी भंडारा कार्यक्रम में 28 मई 2022 सायंकाल उज्जैन आश्रम में दिए व यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि गुरु महाराज का यह संकल्प था कि कलयुग में कलयुग जाएगा और सतयुग आएगा। तो सतयुग ऐसे नहीं आएगा। कलयुग जाने लगेगा तो थप्पड़ लगाएगा। बहुतों का वारा-न्यारा हो जाएगा। कैसे भी मरें, धरती फटने से, आसमान टूटने से, सूखा, अकाल, भुखमरी से, लड़ाई झगड़ा वार से या एटम बम, परमाणु बम में खत्म हो जाएं लेकिन खत्म तो होना ही होना है। अब सोचो प्रेमियों जब सब मर ही जाएंगे तो सतयुग देखेगा कौन? इसलिए बचाने की जरूरत है। आप सन्त के बंदे हो, जीव हो, आपको इनको बचाने की जरूरत है।


*गुरु की मौज जो हो, भक्त अगर उस तरह का काम करे तो गुरु का प्यारा हो जाता है*


गुरु की मौज जो हो, उस तरह का आदमी अगर काम करें, भक्त काम करें, प्रेमी काम करें तो वह उनका प्यारा हो जाता है, उस पर दया ज्यादा हो जाती है। जैसे आपके 4 बच्चे हैं जो आपके आदेश का पालन करें। चारों खड़े हैं। कहा एक गिलास पानी ले आओ तो 3 तो रुके हैं, इंतजार कर रहे हैं और एक दौड़ कर ले आया तो आपका प्यारा हुआ कि नहीं हुआ? कहोगे बहुत अच्छा लड़का है, बहुत अच्छा काम करता है तो आप उनके प्यारे हो जाओगे I


*प्रेमियों! लोगों को समझाओ कि सतयुग लायक बन जाये*


आप समझाओ, लोगों को सतयुग देखने के लायक बनाओ। अगर कलयुगी ही रहेंगे तो कलयुग इनको रगड़ता हुआ ले जाएगा, चिल्लाते रह जाएंगे। इसलिए आप इनको सतयुग के योग्य बनाओ। लोगों में प्रचार करो, उनके अंदर शाकाहारिता लाओ। समझो-


*जैसा खावै अन्न, वैसा होवै मन।* 

*जैसा पियै पानी, वैसी होय बानी।।*


देखो भीष्म पितामह योगी थे लेकिन द्रोपदी की लाज नहीं बचा पाए थे। अंत समय में बाणों की शैया पर लेटे अच्छी-अच्छी बात बता रहे थे। कहते हैं, ज्ञान जो भी हो बांटना चाहिए नहीं तो शरीर के साथ हुनर ज्ञान सब चला जाता है। तो द्रोपदी ने हंस दिया। पूछा, द्रोपद्री तुम क्यों हँसी? तो बोली महाराज ऐसे ही हँस दिया। नहीं तेरे हंसने में तो राज हुआ करता है। तूने हँस करके इतना बड़ा महाभारत करा दिया, बोल क्यों हँस रही है। तब वह बोली कि यह ज्ञान बुद्धि उस समय कहां चली गई थी तब दुर्योधन मेरी चीर खींच कर नंगा कर रहा था? अब आप ज्ञान की बात कर रहे हो। तब उन्होंने इस बात को महसूस किया। कहा, द्रोपदी तू ठीक कह रही है। उस समय मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी क्योंकि मैं दुर्योधन पापी का अन्न खा रहा था।


*पापी का अन्न खाओ तो दोष लगता है, जब जानवरों का मांस खाओगे तो कैसे देखेंगे सतयुग*


अन्न का इतना दोष होता है। जब जानवरों का मांस, खून शरीर के अंदर आएगा तो सोचो बुद्धि सही रहेगी? कभी भी नहीं रहेगी। कलयुग का यह अपराध उनसे दूर होगा ही नहीं, अपराध वह बराबर करते ही रहेंगे। आप देखो जानवरों को कुछ पता नहीं रहता है। बुद्धि उनके नहीं होती है। किसी को मार देते, हमला कर देते हैं। जब वैसी बुद्धि आदमी में रहेगी तो कहां से सतयुग देख पाएंगे?कहां से आप सतयुग ला पाएंगे, गुरु के भक्त कहे और गुरु भक्त बन पाआगे? इसलिए प्रेमियों! लोगों को समझाओ।

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