मुक्ति-मोक्ष प्राप्ति के लिए इन्हें छोड़ो- चोरी जुआ मुखबिरी ब्याज घूस परनारी

 मुक्ति-मोक्ष प्राप्ति के लिए इन्हें छोड़ो- चोरी जुआ मुखबिरी ब्याज घूस परनारी



पहले आदमी की नीयत अच्छी थी तो बरकत होती थी खूब



नालासोपारा (मुंबई)।मनुष्य के उत्थान को रोकने वाली गलत आदतों और बाधाओं को रेखांकित कर उनसे बचने के उपाय बता कर भौतिक और आध्यात्मिक दोनों तरक्की का मार्ग प्रशस्त करने वाले, सरल शब्दों में समझा कर पारलौकिक घर महल बनाने के लिए आचार, विचार, व्यवहार रूपी नींव को मजबूत करने वाले, इस समय के महान समाज सुधारक, पथ प्रदर्शक, गाइड, जगह-जगह लोगों के बीच जाकर उनमें जागृति लाने वाले पूर्ण समर्थ सन्त सतगुरु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने 5 जून 2022 सायंकाल नालासोपारा मुम्बई में दिए व यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि कुछ ऐसे लोग होते है जो ब्याज पर ब्याज लगाते चले जाते हैं। कोई कितना भी रोये, गिड़गिड़ाये, सुनवाई नहीं करते हैं। निष्ठुर हो जाते हैं। आदत बन जाती है उनकी क्रूरता की। वह जो पैसा दिल दु:खा कर लाते हैं, वह खाते हैं तो उससे बुद्धि और खराब होती है। इसीलिए कहा गया है-


*चोरी जुआ मुखबिरी ब्याज घूस परनारी।*

*जो चाहे दीदार को ऐति वस्तु निवार।।*


चोरी करने वाले, जुआ खेलने वाले, मुखबिरी करने वाले, जासूसी कौन सी? एक तो नौकरी की जासूसी होती है और एक वह होती है की इनको पटको बताओ चुगली जिसको कहते हो, वह होती हैं। इसे करने वाले, ब्याज खाने, घूस खाने वाले, परनारी को गलत नजर देखने वाले का मुक्ति मोक्ष नहीं होता है। इन सबसे दूर रहना चाहिए।


*पहले आदमी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाता था, कहता था मर जाऊं मांगू नहीं भीख*


पहले जितना है उसी में गुजर करेंगे, वहीं खाएंगे। कुछ लड़का लड़की की शादी के लिए, खेती के टैक्स लगान को देने के लिए भी बचा कर के रखता था और बरकत भी खूब होती थी क्योंकि नीयत अच्छी थी, बरकत खूब होती थी।


*पहले के समय में लोगों की नीयत सही थी तो बरकत होती थी*


पहले आदमी थोड़ा कमाता लेकिन खाने के बाद भी उसमें से कुछ बच जाता था। अब लोगों की हो गई नीयत खराब तो बरकत हो गई बंद। दूसरा आवश्यकताएं बहुत बढ़ गई, जरूरत से ज्यादा आदमी खर्चा करने लग गया।


*ऐसी गंदे शौक़ पड़ गए कि कर्जा लेना ही पड़ता है*


देखो नशे की और तमाम गंदी आदतें पड़ गई जिसमें पैसा ज्यादा खर्चा होता है, कर्जा लेना पड़ता है। कुछ तो मजबूरी में लेना पड़ता है। कुछ तो जीवन भर कर्जदार रहते हैं। जो दरबारदारी करते हैं, जी हुजूरी, जी सरकार करते हैं, आगे-पीछे घूमते हैं वह कर्जदार ही रहते हैं। गांव में कहावत है जो उत्तर प्रदेश के हो-

सुख चाहे तो खेती करे, धन चाहे व्यापार।

ठाठ चाहे तो करे नौकरी, ऋण चाहे दरबार।।

लेकिन कर्जा देने वाले को यह चाहिए कि ज्यादा ब्याज न ले। एक परसेंट भी वो लेगा तो साल का बैंक से ज्यादा पा जाएगा, 12 परसेंट पा जाएगा। वह जो मिलेगा उसका मेहनत का होगा। उसमें से भी जो खर्चे से बचे, गरीबों को खिलाने में, इधर-उधर अच्छे काम में खर्च कर देना चाहिए।


*आप पावर में हो, किसी का काम किये, वो खुशी से दे तो आपके लिए फलीभूत दूध के समान होगा*


कुछ लोग तो नौकरी में कहते हैं, लाओ इतना दे दो, जिसको घूस रिश्वत कहते हैं। इतना दोगे तब फाइल आगे बढ़ेगी, तब इस पर चिड़िया बैठेगी मतलब हस्ताक्षर होगा। कुछ ऐसे होते हैं चलो काम कर देते हैं हंसी खुशी से। कुछ खुशी से स्वयं देगा वह हमारे लिए फलीभूत होगा। वह जो देगा वह आपके लिए दूध के समान होगा। कहा गया है-

सहज मिले सो दूध सम, मांगे मिले सो पान।

कहे कबीर वो रक्त सम, जामे खींचा तान।।

खींचतान होती है। कहा इतना रखो, खींचातानी होगी। कहां कैसे दें, फाइल आगे नहीं बढ़ेगी, काम नहीं होगा। जो नौकरी करते हो, खुश हो जाए, कोई दे दे तो कोई बात नहीं लेकिन यह जबरदस्ती वाला काम यह परमार्थियों के लिए आगे बढ़ने में बाधक बनता है, इससे दूर रहना चाहिए।

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