एमपी में सरकार गंवाने के बाद अब कांग्रेस के सामने आंतरिक चुनौतियां, बाहर तो पहले से मोर्चे खुले हुए

मध्य प्रदेश, मध्य प्रदेश में सरकार गंवाने के बाद कांग्रेस अब आंतरिक चुनौतियों से घिर गई है। बाहर तो मोर्चे खुले ही हैं, उप चुनाव में करारी हार के बाद अंदर भी कई मोर्चे खुल चुके हैं। खुद पार्टी के कार्यकर्ता ही हार के कारणों की समीक्षा चाहते हैं, लेकिन राज्य एवं केंद्रीय नेतृत्व ने मुंह सिल रखा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उप चुनाव में मिली हार की जिम्मेदारी अभी तक किसी ने नहीं ली है। खुद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह सरकार और ईवीएम पर हार का ठीकरा फोड़ रहे हैं। तो क्या असल वजह ईवीएम है जिसके पीछे कमल नाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस छिपाना चाहती है। यह सवाल कांग्रेस के अंदर भी उठने लगे हैं।


लगभग पंद्रह साल के वनवास के बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी पार्टी होने के कारण राज्य की सत्ता मिली थी। उसने सपा, बसपा और निर्दलीय विधायकों के गठजोड़ से कमल नाथ के नेतृत्व में सरकार बनाई। तब ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के झंडाबरदार थे। वह खुद भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने सिंधिया के बजाय कमल नाथ को तरजीह दी।


कमल नाथ ने सिंधिया के खिलाफ जबर्दस्त गोलबंदी करके संगठन और सत्ता पर अपनी पकड़ बना ली थी, लेकिन समय के साथ उनकी पकड़ ढीली होने लगी। महज सवा साल के अंदर ही सिंधिया, कमल नाथ एवं दिग्विजय के झगड़े सार्वजनिक होने लगे। उनकी असहमति गोलबंदी का रूप ले चुकी थी। सत्ता की इस लड़ाई में कमल नाथ को दिग्विजय सिंह का साथ मिल गया। फिर दोनों ने हर मोर्चे पर सिंधिया की घेरेबंदी में कोई कमी नहीं छोड़ी।



उन्हें उम्मीद थी कि दोनों की मजबूत गोलबंदी के कारण सिंधिया शिथिल पड़ जाएंगे। वे यह भी मानने लगे थे कि सिंधिया किसी भी स्थिति में कांग्रेस नहीं छोड़ सकते। दोनों का यही आकलन गलत साबित हुआ। सिंधिया ने मोर्चा लेने में कोई कमी तो नहीं छोड़ी, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व द्वारा आंखें मूंद लेने के कारण वह पार्टी के अंदर अलग-थलग पड़ते गए।


 


अंतत: अपनी अनदेखी से नाराज होकर सिंधिया ने वही किया, जिसका अनुमान कमल नाथ-दिग्विजय के साथ कांग्रेस नेतृत्व को भी नहीं था। उनके एक झटके से कमल नाथ सरकार गिर गई। सत्ता और संगठन के प्रबंधन में निपुण कमल नाथ काफी प्रयत्न के बाद भी स्थिति नियंत्रित नहीं कर पाए। इस तरह सिंधिया के विद्रोह के कारण राज्य में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन गई।


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