झाऊपुर निस्क्रांत सम्पत्ति प्रकरण, वरासत के खेल में तत्कालीन लेखपाल की रहीं अहम भूमिका

झाऊपुर निस्क्रांत सम्पत्ति प्रकरण, वरासत के खेल में तत्कालीन लेखपाल की रहीं अहम भूमिका


 सवालों के घेरे में 60ख की कार्यवाही, राजस्व परिषद ने तलब किए दस्तावेज़, कई राजस्व कर्मी व अधिकारियो पर हो सकती है कार्यवाही


फतेहपुर। शहर के झाऊपुर इलाक़े में बहुचर्चित निस्क्रांत सम्पत्ति प्रकरण में सरकारी तन्त्र की शिथिलता प्रकाश में आई है। आजादी के बाद देश छोड़कर जाने वाले मोहम्मद अहमद एवं इफ्तेखार अहमद की अचल सम्पत्ति (ज़मीन) पर कभी भी सरकारी कब्ज़ा नही हो सका, ये अलग बात है कि सरकारी दस्तावेजों में इसे निस्क्रांत संपत्ति के रूप में दर्ज कर लिया गया।
गौरतलब है कि फतेहपुर सदर तहसील के दस्तावेजों पर गौर करें तो मिलता है कि इफ्तेखार अहमद के हिस्से की लगभग 1.8 बीघा ज़मीन अभी भी निस्क्रांत संपत्ति के रूप में दर्ज है। जबकि मो. अहमद के हिस्से की 1.8 बीघा ज़मीन वरासत की कार्यवाही पूर्ण होने के बाद शाह हुसैन के नाम अंकित हो गई है। बताते चलें कि इस पूरी ज़मीन की आराजी में तत्कालीन लेखपाल नरपत सिंह की भूमिका काफ़ी महत्वपूर्ण रही है।
वरासत कराने वाले शाह हुसैन उप जिलाधिकारी सदर की अदालत में बटवारे का वाद योजित करने का साहस नही जुटा पाया, वजह थी कि अदालत में अगर बंटवारे का वाद योजित होता तो तकनीकी कारणों से मोहम्मद अहमद एवं इफ्तेखार अहमद की मौजूदगी का मसला फसता। उस स्थिति में न्यायालय में बग़ैर उन दोनो की मौजूदगी के वाद प्रस्तुत न हो पाता या फ़िर निस्तारण में पेच फसता। शायद यही वजह रही कि शाह हुसैन आदि ने लेखपाल को मोहरा बनाकर 60 ख के दस्तावेज़ तैयार करके शाह हुसैन का काम आसान कर दिया।
यहां पर सवाल यह उठता है कि आखि़र किन परिस्थितियों में तत्कालीन लेखपाल नरपत सिंह ने 60 ख के दस्तावेज़ बनाकर शाह हुसैन को उपलब्ध कराए, क्योंकि उस समय शाह हुसैन को उस आराजी का स्वामित्व भी प्राप्त नहीं था और बग़ैर स्वामित्व के 60 ख की कार्यवाही लेखपाल के द्वारा किया जाना कहीं से भी न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। जिस समय 60 ख के तहत् कार्यवाही को अमल में लाया गया, उस समय सरकार का ही स्वामित्व था। ऐसे में लेखपाल की रिपोर्ट ने समूचे गड़बड़झाले की पटकथा लिखने में अहम भूमिका निभाई।
मौजूदा समय में भी इस निस्क्रांत संपत्ति पर राजस्व विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है। राजस्व विभाग इफ्तेखार अहमद के हिस्से की ज़मीन जो निस्क्रांत संपत्ति अभिलेखों में दर्ज़ है, उसे भी नही बचा पा रहा है। अपने आप में यह अबूझ पहेली बना हुआ है कि आखि़र क्यों प्रशासनिक जिम्मेदार इस बड़े प्रकरण की ओर से मुंह मोडे हुए हैं। चर्चा यह भी है कि इस ज़मीन पर सत्ता पक्ष के लोगों की नजर गड़ी हुई है, जिससे जिम्मेदार अधिकारी चाह कर भी कोई कार्यवाही नहीं कर पा रहे हैं! यहां पर यह भी गौरतलब है कि निस्क्रांत संपत्तियों को लेकर योगी सरकार की गंभीरता भी स्थानीय अधिकारियों के लिए आखि़र क्यों मायने नहीं रखती
राजस्व परिषद के चेयरमैंन द्वारा शत्रु एवं निस्क्रांत संपत्तियों का ब्योरा प्रदेश के सभी जिलाधकारियों से तलब किया गया है, बावजूद इसके फतेहपुर फ़िलहाल इस आदेश का कोई असर नहीं दिख रहा है। इस स्थिति में मौजूदा जिला प्रशासन द्वारा आराजी संख्या 74 एवं 203 का ब्योरा अन्य संबंधित संपत्तियों के साथ साथ राजस्व परिषद को उपलब्ध कराने पर भी संशय बरकरार है। किन्हीं परिस्थितियों में इस आराजी का ब्योरा राजस्व परिषद को उपलब्ध भी कराता है तो कईयों को नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। इस मामले में विभागीय अधिकारियों की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।