तेरह साल बाद एसबीआई के खिलाफ एफआईआर की तैयारी

 तेरह साल बाद एसबीआई के खिलाफ एफआईआर की तैयारी



पौने छः लाख के मामले में विभागीय जिम्मेदारों की भूमिका संदिग्ध, नक़द पैसा जमा करानेके बावजूद ठोका जा रहा दावा


योगी के तंत्र में बड़ा होल, अवशेष देयों के भुगतान के लिए भटक रहे दिवंगत एई के परिजन


सिर्फ़ कागज़ी घोड़े दौड़ा कर अपने कर्तव्यों की इति श्री करते रहे हैं अधिकारी


तीन साल तक खाते से अतिरिक्त राशि डेविट होने की नहीं लगी भनक, आडिट में पकड़ में आया था मामला


न कटौती, न एफआईआर, वाह भाई वाह, यह बिजली विभाग है, यहां सब चलता है


फतेहपुर। योगी सरकार में भी विद्युत विभाग की हवा- हवाई गतिविधियों परअंकुश नहीं लग पा रहा है! अंदरूनी खामियों का आलम यह है कि लगभग 13 वर्षों से विभाग के लगभग पौने छः लाख रुपए की वापसी के नाकाफी प्रयासों के चलते जिम्मेदार किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। मीडिया ट्रायल शुरू होने के बाद आनन - फानन में अधिशाषी अभियंता ने एसबीआई के खिलाफ एफआइआर दर्ज़ कराने के आदेश तो जारी कर दिए गए किंतु 09 दिन बाद भी इस पर अमल नहीं हो पाया है। इस मद में विभाग के अधिकारी और कर्मचारियों की भूमिका अब तक संदिग्ध रही है।

उल्लेखनीय हैं कि मात्र कुछ हज़ार रुपए की बकायेदारी पर विद्युत विभाग अपने उपभोक्ताओं के कनेक्शन काटकर आरसी आदि की कार्यवाही अमल में लाने में देर नहीं करता है, किन्तु पौने छः लाख रुपए की वापसी के लिए उसके कर्ता-धर्ता अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सके हैं। जिम्मेदार इस मद में कभी भी बहुत ज्यादा गंभीर नहीं हुए, सिर्फ़ कागज़ी घोड़े दौड़ा कर अपने कर्तव्यों की इति श्री करते रहे है।

बताते चलें कि विद्युत विभाग ने तत्कालीन जूनियर इंजीनियर लल्लन प्रसाद को 21 अक्टूबर 2008 को चेक सं. 590370 के माध्यम से भारतीय स्टेट बैंक के  विभागीय व्यय (अधिशाषी अभियंता पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड प्रथम, फतेहपुर) खाते से 11437 रूपए की एक चेक किसी भुगतान के बाबत काटी थी। उन्होंने यह चेक अपने खाते में लगाईं तो बैंक ने क्लियरिंग के दौरान विभाग के खाते से 11437 रूपए के स्थान पर 590370 रूपए डेविट कर यह धनराशि लल्लन प्रसाद के खाते में क्रेडिट कर दी।

विभाग के जिम्मेदारों को खाते से अतिरिक्त धनराशि डेविट होनें की भनक काफ़ी समय तक नहीं लगी किन्तु कुछ माह बाद लल्लन को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने तत्कालीन अधिशाषी अभियंता और लेखाकार को इसकी जानकारी दी। उनसे कहा़ गया कि यह पैसा नक़द वापस कर दें, विभाग अपने तरीके से अर्जेष्ट कर लेगा। लगभग साढ़े पांच माह बाद लल्लन प्रसाद ने अरिरिक्त धनराशि 578933 रूपए नक़द अधि. अभि. के सामने लेखाकार को लौटा दिया।इस प्रकरण के बाद कई वर्षों तक लल्लन यहां तैनात रहे और फ़िर कानपुर स्थानांतरित होकर कानपुर चले गए, तब तक मामला दबा रहा। जून 2011 में आडिट के दौरान 578933 रूपए समेत कुछ और धनराशि एकाउंट में शार्ट होने का मामला पकड़ में आया, जिसके बाद पड़ताल शुरु हुईं और बैंक को पत्र लिखकर जानकारी मांगी गई। यानी तीन साल तक मामले को दबाकर रखा गया! तब तक तत्कालीन अधि. अभि., लेखाकार यहां तक कि लल्लन का भी यहां से स्थानांतरण हो चुका था। नए अधिकारी और कर्मचारी के लिए उपरोक्त धनराशि की वस्तु स्थिति का पता लगा पाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा था। इस बीच बैंक ने कार्याल्याध्यक्ष को 19 सितंबर 2011 को तल्ख़ टिप्पणी के साथ एक पत्र लिखा जिसमें विभाग के पत्रांक 2894 दिनांक 05 सितंबर 2011 के पत्र के ज़वाब में लिखा कि चेक संख्या 983142 दिनांक 16 अप्रैल 2008 रु. 8600 की राशि जो कि दो बार भुगतान हो गई थी, 17 सितम्बर 2011 को विभाग के खाते में जमा करके त्रुटि का निवारण कर दिया गया। चेक संख्या 581874 दिनांक 04 सितंबर 2008 रु. 8469 की राशि ठीक करके अधिक भुगतान की गई राशि विभाग के खाते में 17 सितंबर 2011 को जमा करके त्रुटि का निराकरण कर दिया गया है।

इस पत्र में बैंक ने स्वीकार किया कि चेक संख्या 590370 दिनांक 27 अक्टूबर 2008 रु. 11437 का भुगतान त्रुटिवश रु. 590370 लल्लन प्रसाद के खाता संख्या 10946359595 में जमा हो गया है। इस त्रुटि को विभाग द्वारा लगभग 03 वर्ष के पश्चात इंगित करने के कारण यह धनराशि खातेदार द्वारा निकालकर अपने उपयोग में ले ली गई है। इस पत्र में बैंक ने स्पष्ट टिप्पणी के साथ कहा़ कि लल्लन प्रसाद 33 केवीए बिंदकी में नियुक्त कर्मचारी हैं, जो कि वहा से अन्यत्र स्थानांतरित हो गए हैं। बैंक द्वारा इस पत्र के माध्यम से तत्कालीन अधि. अभि. से अपेक्षा  की गई कि लल्लन प्रसाद का वर्तमान नियुक्ति स्थान व पता उपलब्ध कराएं ताकि उनसे संपर्क करके उनके द्वारा अधिक निकाली गई राशि सुनिश्चित कराकर विभाग के खाते में क्रेडिट कराकर इस त्रुटि का निराकरण किया जा सके। बैंक ने लल्लन प्रसाद के मामले में विभाग से सहयोग की अपेक्षा की किन्तु विभाग के लचर रवैय्ये के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी! वजह मानी जा रही है कि, क्योंकि लल्लन ने तो अधिकारी के सामने लेखाकार को पैसे लौटा दिए थे, अब विभाग सिर्फ़ खानापूरी कर रहा था।यहां पर गौरतलब है कि अगर लल्लन प्रसाद पैसा वापस नहीं कर रहे थे, तो कानपुर में तैनाती के दौरान किसी मामले में उनके निलंबन से पूर्व लगभग 74 माह तक विभाग ने अपने मुख्यालय को वेतन से कटौती का पत्र क्यों नहीं लिखा या फ़िर एफआईआर क्यों नहीं दर्ज़ करवाई गई...? यह सब कुछ इस मामले को और अधिक संदिग्ध बनाता है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार लल्लन प्रसाद कानपुर से निलम्बित होने के बाद इस वर्ष के शुरुआती कुछ माह तक मुख्य अभियंता (वि.) इ.क्षे. 73 टैगोर टाउन प्रयागराज में बतौर सहायक अभियंता संबद्ध रहे किन्तु विभाग इस धनराशि की उनसे वसूली के बाबत कोई तरीका नहीं अपनाया। कुछ माह पूर्व लल्लन प्रसाद की मौत के बाद उनके परिजनों ने जब अवशेष देयो और पेंशन आदि के लिए मुख्य अभियंता (वि.) प्रयागराज के कार्यालय में पत्राचार किया और सम्बंधित अधिकारी ने स्थानीय अधिशाषी अभियंता प्रथम को अनापत्ति प्रमाणपत्र के लिए पत्र भेजा तो स्थानीय कार्यालय के भ्रष्ट तन्त्र की बांझे खिल गई। एनओसी देना तो दूर उल्टे मृतक लल्लन के परिजनों पर 578933 रूपए तत्काल विभाग में जमा कराने पर ही एनओसी देने की शर्त थोप दी।

दूसरी ओर विद्युत विभाग के अधिशासी अभियंता प्रथम रामसनेही द्वारा विगत 24 अगस्त को एक पत्र (पत्रांक 3410) जारी करके कार्यालय के सहायक लेखाधिकारी (कार्य) मुकुल गुप्ता एवं कैशियर (कार्य)/कार्यालय सहायक अजीत सिंह को निर्देशित किया गया कि लल्लन प्रसाद के मामले में सम्बंधित बैंक की घोर लापारवाही साबित हुईं है, इसलिए भारतीय स्टेट बैंक सिविल लाइन फतेहपुर के सक्षम अधिकारी के विरूद्ध सुसंगत धाराओं में तत्काल प्राथमिकी दर्ज़ कराकर उन्हें व मुख्य अभियंता (वितरण) प्रयागराज को अवगत कराएं। बावजूद इसके अब तक दोनों कर्मचारियो द्वारा इस पत्र के अनुपालन में कोई कार्यवाही सुनिश्चित नहीं की गई है। ख़बर है कि मुकुल गुप्ता कानपुर से आवागमन करते हैं, और हफ़्ते में एक दो दिन ही आते हैं। अजीत सिंह कहते हैं कि जब मुकुल गुप्ता कहेंगे मै साथ चला जाऊंगा।

उधर मुख्य अभियंता (वि.) के हवाले से वहा के अधिशाषी अभियंता (प्र.नि.) जय शंकर राय ने विगत 25 अगस्त 2021 को (पत्रांक 6794) स्थानीय अधिशासी अभियंता विद्युत वितरण खंड प्रथम को पत्र भेजकर स्व. लल्लन प्रसाद की पत्नी गुलपत्ती देवी के विगत 04 अगस्त 2021 के शिकायतीपत्र का हवाला देते हुए वार्षिक वेतन वृद्धि एवं टाइम स्केल के निस्तारण हेतु मंडलायुक्त प्रयागराज मण्डल को क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा समस्त बकाए पर की गई कार्यवाही का विवरण प्रेषित करने हेतु पूर्व के विभिन्न पत्रों का हवाला देते हुए उक्त प्रकरण में अदेयता प्रमाण पत्र निर्गत करने में उनके द्वारा किए जा रहे विलम्ब पर रोष व्यक्त करते किन कारणों से अदेयता प्रमाणपत्र निर्गत नहीं किया गया, वस्तु स्थिति से क्षेत्रीय कार्यालय को अतिशीघ्र संज्ञानित कराने के निर्देश दिए गए।

उपरोक्त प्रकरण में अधिशासी अभियंता विद्युत वितरण खंड प्रथम कार्यालय के ओएस का कहना है कि 578933 रूपए की कटौती स्व. लल्लन प्रसाद के अवशेष देयों से की जायेगी। वह इस मामले में बैंक को बहुत ज्यादा दोषी नहीं मानते। उन्होंने कहा कि इसमें लल्लन प्रसाद की नियत ख़राब रही है। उन्होंने खाते में पैसा आने के बावजूद वापस नहीं किया। कुल मिलाकर अधिशासी अभियंता विद्युत वितरण खंड प्रथम (फतेहपुर) कार्यालय के 578933 रूपए का मामला पूरी तरह संदिग्ध बना हुआ है। सोचनीय विषय है कि सूबे के भ्रष्टतम विभागों में शुमार विद्युत विभाग के कर्ता-धर्ता इतने लम्बे समय तक क्यों नींद में रहे और कोई प्रभावी कार्यवाही क्यों नहीं की गई, यह अपने आप में बड़ा विषय है। इतना ही नहीं इस मामले के साथ जो तीन मामले आडिट के दौरान पकड़ में आए थे, उनका कोई हवाला सम्बंधित पत्रवालियो में फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं।

यहां पर यह भी गौरतलब है कि तत्कालीन अधिशाषी अभियंता आरआर सिंह ने लल्लन सिंह को पत्रांक 5181 दिनांक 22 मई 2012 के माध्यम से चेतावनी दी थी कि अगर उनके द्वारा 578933 रूपए उनके कार्यालय में नक़द/चेक द्वारा जमा नहीं करवाए जाते तो उनकी सत्य निष्ठा संदिग्ध मानते हुए उपरोक्त धनराशि ब्याज सहित उन्हें मिलने वाले देयों से कटौती कर ली जायेगी। यहां पर गौर करने वाली बात है कि अधिकारी ने चेतावनी के बावजूद न तो किसी प्रकार की कटौती की और न ही विधिक कार्यवाही ही अमल में लाई गई। लल्लन के परिजनों का दावा है कि विभाग ने लगभग प्रारम्भ में ही उपरोक्त धनराशि नक़द जमा करवा ली थीं, अब क्यों दावा किया जा रहा है, उनकी समझ से परे हैं, जो जॉच का विषय है। कहा़ कि अगर अनायास कटौती की या जल्द अवशेष देयों का भुगतान न किया गया तो अदालत का दरवाज़ा खटखटाने को विवश होंगे। परिजन इस तरह के कोई पत्र कभी भी लल्लन प्रसाद को प्राप्त न होने का दावा करते हैं।