इतिहास साक्षी है कि कैसे सन्तों ने जीवों के कर्मों को काटा, कष्टों से मुक्ति दिलाकर जीवात्मा को अपने घर, मालिक के पास पहुंचा दिया

 इतिहास साक्षी है कि कैसे सन्तों ने जीवों के कर्मों को काटा, कष्टों से मुक्ति दिलाकर जीवात्मा को अपने घर, मालिक के पास पहुंचा दिया



शारीरिक व मानसिक कष्ट दूर करने के उपाय सतसंग में बताए जाते हैं


नकली नोट के समान ये दुनिया किसी की नहीं हुई


उज्जैन (मध्य प्रदेश)।शारीरिक व मानसिक कष्टों को दूर करने के उपाय बताने वाले, भक्तों की संकट में मदद करने वाले जिसे आम जन चमत्कार की संज्ञा देते हैं, जीते जी प्रभु प्राप्ति का रास्ता नामदान देने के एकमात्र अधिकारी, इस समय के पूरे समर्थ सन्त सतगुरु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने बुद्ध पूर्णिमा 15 मई 2022 सायंकाल को उज्जैन आश्रम में दिए व यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर लाइव प्रसारित संदेश में बताया कि प्रेमियों! उस मालिक की बहुत बड़ी दया से आज सतसंग और ध्यान-भजन करने का मौका मिला। उसकी मेहरबानी के बिना आज के इस घोर कलयुग में इंसान को समय नहीं मिल पा रहा है। पहले लोगों ने बराबर नियम बना रखे थे कि सतसंगों में हमें जाना है। सन्तों ने सतसंग में लोगों को बुलाया, तरह-तरह से समझा कर अंतःकरण को साफ किया, कर्मों को काटा और जीवात्मा को अपने घर, मालिक के पास पहुंचा दिया। इतिहास इसका साक्षी है। सारी बातें इतिहास में लिखी हुई है। इतिहास इसलिए लिखा जाता है कि भविष्य में लोग पढ़ेंगे, समझेंगे और अनुकरण करेंगे। अच्छी बातों को ग्रहण करें, अच्छे स्वभाव के बन जाए, मानवता आ जाए, देश सेवा की भावना जग जाए।


*सतसंग क्या है*


जैसे बाजारों में हर तरह की चीजें मिलती हैं। जरूरत की चीज व्यक्ति ले लेता है। बाजार लगवाने वालों की कोशिश रहती है कि हर तरह की दुकानें रहे, कोई भी खाली न लौटे, जरूरतमंद को हर चीज मिल जाए। इसी तरह से सन्त भी सतसंग में में हर तरह की बातें बताते हैं। जिसको जिस चीज की जरूरत होती है वह अपने संस्कार के अनुरूप पकड़ कर अमल करता है।


*गलत कर्म चाहे धार्मिक स्थानों पर किये जायें, तकलीफों को बढ़ा देते हैं*


लोग इच्छा लेकर सुनाए, बताए गए धार्मिक स्थानों पर जाते हैं। इच्छा तो उनके अच्छे कर्मों से पूरी होती है। लेकिन कई लोग ऐसे स्थानों पर जाकर कर्म खराब कर लेते हैं, बुराइयां अपना लेते हैं। उनको कोई फायदा नहीं होता बल्कि उनके अच्छे कर्मों में से और कट जाता है, और भी तकलीफ आ जाती है।


*कष्टों से मुक्ति का उपाय भी सतसंग में बताया जाता है*


शरीर को चलाने के लिए जिन चीजों की जरूरत होती है जैसे अन्न पानी धन सम्मान आदि की प्राप्ति का तरीका भी सतसंग में बताया जाता है, नियम-संयम अपनाओ। ऋषि मुनियों के बनाए संयम से जब रहोगे तो बीमारियों तकलीफों से बचे रहोगे। बुढ़ापे में स्वाभाविक रूप बीमारी, कमजोरी आती है लेकिन जिनकी आदत बचपन, जवानी में संयम-नियम की बन जाती है वो बुढ़ापे में भी स्वस्थ रहते हैं। लेकिन इस समय तो किसी का कोई भरोसा नहीं है, कब किसको रोग-तकलीफ हो जाए। जवान लोग, छोटे-छोटे बच्चे 10-12 साल के, दुनिया छोड़कर जा रहे हैं। रोग, तकलीफ हो गयी, ऑपरेशन भी करवाया, जमीन-जायदाद, जेवर सब बिक गया फिर भी घरवाले बचा नहीं पाए। कहने का मतलब यह है कि सतसंग में हर तरह की बातें मिलती हैं। पकड़ना चाहिए।


*शारीरिक व मानसिक कष्ट दूर करने के उपाय*


नियम-संयम का अगर पालन किया जाय तो शारीरिक कष्ट से छुटकारा मिल सकता है। मानसिक कष्ट क्या है? देखो मेहनत ईमानदारी जो करता है, जिसके विचार-भावनाएं अच्छी रहती हैं, जो धार्मिक भावना से परिपूर्ण होता है, असली मानव धर्म का पालन करता है, प्रभु को बराबर किसी भी रूप में 24 घंटे में से समय निकाल कर थोड़ा भी याद करता रहता है, उसको शांति रहती है। जो इससे विपरीत काम करता है वह अशांत रहता है, उसे मानसिक कष्ट होता है। जो व्यक्ति इन सब का ध्यान रखता है वह शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहता है।


*पहले आपके शारीरिक, मानसिक कष्ट दूर करने के लिए दया दी जाती है तब तो प्रभु की, सतसंग की बात सुन, समझ पाते हो*


शारीरिक या मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को कुछ बताओ तो वह जल्दी समझ नहीं पाता। बीमार आदमी को कुछ अच्छा नहीं लगता। दिमाग में टेंशन है, कर्जा बहुत हो गया, मुकदमा, बीमारी, अपमान निंदा के बारे में सोच रहा है तो सुनता तो रहेगा लेकिन मन कहीं दूसरी जगह रहेगा तो उसे क्या बताया जाए।


*सन्तों की बात मानने से लाभ और तकलीफों में आराम मिलने पर लोग सतसंग में आ पाते हैं*


आप ने जो जान-अनजान में समस्याएं पैदा की, जब तक वे हल नहीं होंगी तब तक आप प्रभु से जल्दी जुड़ नहीं पाओगे। आप लोग जो यहां सतसंग में आये हो, जब आपकी गृहस्थी की समस्याएं ढीली हुई जिसमें आप रोज लगे रहते हो, आप जो बातों को पकड़ते हो, बरकत आपको मिलती है, मेहनत ईमानदारी की कमाई आप करते हो, नियम-संयम से आप रहते हो, शरीर स्वस्थ रहता है तब तो आप यहां तक पहुंचे हो।


*नकली नोट के समान ये दुनिया किसी की नहीं हुई*


यह मनुष्य शरीर अनमोल है। इसकी कोई कीमत नहीं है। यह प्रभु ने कुछ समय के लिए दिया है। इसको याद करो। मुझे आज आपको यही याद दिलाना है, जिसको लोग भूल रहे हैं। मौत को लोग भूल रहे हैं, प्रभु को भूल रहे हैं जो असली है, सत्य है। बाकी यह दुनिया असत्य है, झूठी है। दुनिया किसी की नहीं हुई जैसे नकली नोट किसी का नहीं होता है, कहीं नहीं चलता है। उसी प्रकार यह सब असल की नकल है, नाशवान है। जिसका नाश हो जाए, जो खत्म हो जाए जैसे दिन खत्म रात आए, रात खत्म फिर अगला दिन, अगली तारीख आ जाएगी, पुरानी तारीख वापस नहीं आएगी। परिवर्तन तो होता रहता है, होगा लेकिन यह चीजें नहीं रहेंगी। देखो आपकी उम्र भी बदल जाएगी। कल एक दिन कम हो जाएगी और जब उम्र पूरी होगी तब अन्य लोगों की तरह हमको भी यह दुनिया छोड़कर जाना पड़ेगा।

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