हर पूर्णिमा का कोई न कोई इतिहास है, इस दिन बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को ग्रहण करने का संकल्प बनाना चाहिए

हर पूर्णिमा का कोई न कोई इतिहास है, इस दिन बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को ग्रहण करने का संकल्प बनाना चाहिए



आज पूर्णिमा के दिन से गुरु महाराज से प्रार्थना करना शुरु कर दो कि अबकी भंडारे में हम निराश न लौटें, हमारी झोली भर दो


उज्जैन (मध्य प्रदेश)।त्योंहारों का वास्तविक अर्थ बताने वाले, उनसे पूरा लाभ लेने का तरीका बताने वाले, पिछले महात्माओं का मूल उद्देश्य और आज अपना आध्यात्मिक लाभ तरक्की का मार्ग बताने वाले इस समय के पूरे समर्थ सन्त सतगुरु उज्जैन वाले बाबा उमाकान्त जी महाराज ने वैशाख पूर्णिमा 7 मई 2020 को उज्जैन में दिए व अधिकृत यूट्यूब चैनल जयगुरुदेवयूकेएम पर प्रसारित संदेश में बताया कि बुध्द का शुरू में सिद्धार्थ नाम था। एक दिन सिद्धार्थ ने देखा कि एक आदमी को कपड़े से लपेटे हुए घर से बाहर ले जा रहे थे, औरतें रो रही, छाती पीट रही तो उनको भी होश आया। कुछ दिन बाद गेरुआ वस्त्र पहने, सुंदर सुडौल, चेहरे पर तेज, प्रकाश जैसा चेहरा, मोहनी मूरत, मनमोहक विरक्त को देखा तो देखता ही रहा। सारथी ने बताया यह विरक्त हो गए हैं, महात्मा कहलाते हैं। विरक्त जो गृहस्थी में नहीं पड़ते या गृहस्थी से अलग हो जाते हैं और आत्मज्ञानी हो जाते हैं। उनका चेहरा मोहरा, कपड़े बदल जाते हैं। वह जब मालिक के रंग में रंगते हैं तो उसी तरह का वेश बना लेते हैं। समर्थ गुरु जब मिलते बताते हैं तब आत्मज्ञान हो जाता है।


*पहले लोगों को जानकारी नहीं थी कि गृहस्थी में भी उस मालिक को प्राप्त किया जा सकता है*


सिद्धार्थ को ये जानकारी नहीं थी। कोई बताने वाला, कोई समझा कर रास्ते पर चलाने वाला नहीं मिला तो उन्होंने घर छोड़ दिया। बहुत भटके, प्रयास किया। शरीर बहुत कमजोर हो गया। आज की तरह से सरल साधना उस समय थी नहीं। अब घर, जमीन, जायदाद, बाल बच्चों को किसी को नहीं छोड़ना है। गृहस्थ आश्रम में ही रह करके उसको याद, प्राप्त करना है।


*वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध का जन्म, आत्मज्ञान प्राप्ति और शरीर त्यागने की तिथि भी यही थी*


जिस दिन यह पैदा हुए थे उस दिन भी वैशाख की पूर्णिमा थी। जिस दिन आत्मज्ञान हुआ कि मैं तो परमात्मा का अंश हूं, शरीर को छोड़कर के ऊपर गए, ऊपरी नजारा देखा, वह रात भी वैशाख की पूर्णिमा की ही थी। 80 वर्ष की उम्र रही संसार में जब इन्होंने शरीर छोड़ा। उनके शरीर को त्यागने की तिथि भी यही थी।


*बुद्ध जी ने अपने जीवन में लोगों में सुधारने और प्रचार का लक्ष्य बनाया*


इनके बहुत से प्रचारक हुए। उन्होंने भारत में ही नहीं विदेशों में भी, कई देशों में प्रचार किया। बहुत से देश ऐसे हैं जहां बौद्ध धर्म का प्रचार बहुत ज्यादा हैं। आज के दिन बुद्ध पूर्णिमा को महत्व ज्यादा देते हैं।


*पूर्णिमा पर बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को ग्रहण करने का संकल्प बनाना चाहिए*


हर पूर्णिमा का कोई न कोई इतिहास हुआ करता है। पूर्णिमा के दिन बुराइयों को छोड़ना चाहिए। इसे त्यौहार की तरह खुशी-खुशी मनाना चाहिए और अच्छाई को ग्रहण करना चाहिए। प्रेमियों को इन पिछली परंपराओं से गुरु महाराज ने अलग कर दिया क्योंकि वैसा माहौल, समय व स्थान नहीं रहा। उस तरह की धार्मिकता, सत्य, अहिंसा वादी प्रवृत्ति, त्याग, वैराग्य अब नहीं रहा। इस शरीर को भोग में लगा दिया। पहले बचपन से ही योग सिखाया जाता था, लोग योगी बन जाते थे। गृहस्थ आश्रम में भी और उससे बाहर भी रह करके उस मालिक को बराबर याद करते थे। पूजा-पाठ का नियम बना हुआ था। लेकिन अब वह सारी चीजें इस कलयुग में खत्म होती दिखाई पड़ रही हैं। इसलिए पूजा उपासना आदि को सरल किया गया।


*अगली पूर्णिमा तक अपना काम बना लो*


आज पूर्णिमा के दिन आप सब लोगों को इन चीजों को समझने और अच्छी चीजों को अपनाने की जरूरत है। आज पूर्णिमा की तिथि को संकल्प बनाओ की अगली पूर्णिमा तक हम अपना काम बना ले। क्योंकि यह तो आती रहेगी, उम्र को काटती रहेगी। आपको किसी को भी नहीं पता है कि हम कितनी पूर्णिमा देखेंगे। कहा है-

काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।

पल में प्रलय होत हैं, बहुर करोगे कब।।

तो करने की जरूरत है, समय की कीमत लगाने की जरूरत है।


*आज पूर्णिमा के दिन से गुरु महाराज से प्रार्थना करना शुरु कर दो कि अबकी भंडारे में हम निराश न लौटे, हमारी झोली भर दो*


इसलिए अभी से बताएं दे रहे हैं कि दया के घाट पर बैठना शुरू कर दो। भंडारे के दिन आपकी परिस्थिति कैसी रहे, समय मिले न मिले, न कर पाओ, अभी से याद करना शुरू कर दो। गुरु महाराज से दया मांगो। आज पूर्णिमा के दिन से आपके भंडारे में हम निराश न हो, खाली न रह जाएं, हमारी झोली भर दो। ऐसी प्रार्थना अभी से करना प्रेमियों कर शुरू दो।