कॉपी किताबों में कमीशन खोरी का बोलबाला शिक्षा माफियाओं पर प्रशासन की चुप्पी अभिभावकों की जेब में डाका इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले बच्चों पर हर साल एक लाख से दो लाख रुपये खर्च बिदकी फतेहपुर।निजी विद्यालय शिक्षा की आड़ में शिक्षा माफिया एक ऐसा कारोबार कर रहे है। कि जिसे जानकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे इंग्लिश मीडियम स्कूलों ने अभिभावकों के लिए एक ऐसा नियम लागू किया है कि जिसमें एक साधारण आदमी तो निश्चित ही कंगाल हो जाएगा किसी भी क्लास का कोई भी कोर्स आप अगले साल में प्रयोग नहीं कर सकते मतलब साफ है की आपको हर क्लास के लिए नया कोर्स खरीदना पड़ेगा। और पुराना कोर्स रद्दी हो जाएगा जब सच्चाई की पड़ताल की गई तो पता चला कि प्रत्येक शस्त्र में यह कोर्स ना सीबीएसई और ना ही एनसीईआरटी के नियम अनुसार चेंज किया जाता है। बल्कि इंग्लिश मीडियम स्कूल मोटी कमाई के लिए हर साल मन मानें ढंग से कोर्स चेंज कर देते हैं। ताकि हर साल नया कोर्स बिकने पर स्कूलों को मोटा कमीशन मिल सके हैरत करने वाली बात तो यह भी है की जिले के तमाम छोटे बड़े शिक्षण संस्थान व इंग्लिश मीडियम स्कूल का कोर्स शहर की किसी अन्य दुकान पर नहीं मिलेगा कमीशन खोरी के चलते स्कूलों द्वारा निर्धारित दुकानों पर ही कोर्स मिलेगा जिससे हर साल खरीदना अनिवार्य है। हर साल सिलेबस चेंज करने के पीछे निजी विद्यालय कमीशन खोरी के गोरख धंधे के लिए इस सिलेबस चेंज करते हैं अन्यथा 50 फीसदी बच्चे पुरानी किताबों से भी पढ़ाई कर सकते हैं। *अभिभावकों की जेबों पर डाका* स्कूल खुलते ही शिक्षा माफिया ने बच्चों के अभिभावक कि जेब पर डाका डालना शुरू कर दिया है। निजी विद्यालय के संचालकों द्वारा उनके मनचाहे कॉपी किताबें लेने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाया जा रहा है। इनमें इन सभी स्कूलों में नर्सरी से कक्षा 10 तक के बच्चों के लिए विशेष कर यूं कहें सेटिंग वाले की कॉपी किताबों पर ही प्रयोग किया जाता है। इन स्कूलों की शहर में करीब से करीब एक दर्जन से अधिक निजी विद्यालयों की किताबें मिलती हैं स्कूल में बुक्स की लिस्ट के साथ ही कौन सी दुकान से खरीदा जाना है। दुकान का नाम भी बता दिया जाता है इससे अंदाजा लगाया जाता है कि कमीशन के खेल का खेल खेला जा रहा है स्कूल बताते कौन सी दुकान से बुक्स खरीदनी है। नगर में संचालित स्कूल के संचालक कमीशन खोरी के खेल के लिए बुक्स शेलरों से मोटा कमीशन सेट करने के बाद अपने स्कूलों की बुक्स वहीं से नए शस्त्र की खरीदने को कहते हैं और अभिभावकों को बताते हैं। कि कौन सी दुकान से तुम्हें बुक्स फला दुकान पर ही मिलेगी अन्य किसी और दुकान पर नहीं मिलेगी ऐसा लगता है। कि खुलेआम डाल रहे अभिभावकों की जेब पर डाका। हर कोर्स पर 50 से लेकर 60 प्रतिशत कमिश्नर का खेल खेला जाता है। इसके अलावा प्रत्येक कोर्स पर मन मानें ढंग से प्रिंट रेट अंकित किए जाते हैं कॉपी व किताबों को देखकर आप खुद भी अंदाज़ लगा सकते हैं की इसकी कीमत क्या होगी पर आपके अंदाज से दो गुनी कीमत स्टेशनरी पर दर्ज है। ऐसे में इंग्लिश मीडियम स्कूलों द्वारा खुलेआम अभिभावकों की जेब पर ढाका डाला जा रहा। *इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले बच्चे पर हर साल एक लाख से 2 लाख रुपये खर्च* इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे पर हर साल एक एक से दो लाख का खर्च आता है और घर में ट्यूशन लगाना भी जरूरी है। ऐसे में सवाल यह उठना है कि बच्चों को शिक्षा करने में स्कूलों की भूमिका क्या है एक ही स्कूल में हर साल अवैध रूप से दाखिला करने शुल्क वसूलने और किताबें बेचने वाले यह स्कूल कही अपने मक़सद से तो नहीं भटक गए हैं। *चालाकी से बदल देते हैं किताबें* निजी स्कूलों द्वारा शिक्षा की आड़ में कमीशन खोरी का कारोबार काफी पुराना है 50 से 60 प्रतिशत से अधिक मिलने वाले कमीशन के खेल में निजी स्कूल हर साल नए शस्त्र में किताबें बदल देते हैं।

 कॉपी किताबों में कमीशन खोरी का बोलबाला


शिक्षा माफियाओं पर प्रशासन की चुप्पी अभिभावकों की जेब में डाका


इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले बच्चों पर हर साल एक लाख से दो लाख रुपये खर्च



बिदकी फतेहपुर।निजी विद्यालय शिक्षा की आड़ में शिक्षा माफिया एक ऐसा कारोबार कर रहे है। कि जिसे जानकर आप भी हैरत में पड़ जाएंगे इंग्लिश मीडियम स्कूलों ने अभिभावकों के लिए एक ऐसा नियम लागू किया है कि जिसमें एक साधारण आदमी तो निश्चित ही कंगाल हो जाएगा किसी भी क्लास का कोई भी कोर्स आप अगले साल में प्रयोग नहीं कर सकते मतलब साफ है की आपको हर क्लास के लिए नया कोर्स खरीदना पड़ेगा। और पुराना कोर्स रद्दी हो जाएगा जब सच्चाई की पड़ताल की गई तो पता चला कि प्रत्येक शस्त्र में यह कोर्स ना सीबीएसई और ना ही एनसीईआरटी के नियम अनुसार चेंज किया जाता है। बल्कि इंग्लिश मीडियम स्कूल मोटी कमाई के लिए हर साल मन मानें ढंग से कोर्स चेंज कर देते हैं। ताकि हर साल नया कोर्स बिकने पर स्कूलों को मोटा कमीशन मिल सके हैरत करने वाली बात तो यह भी है की जिले के तमाम छोटे बड़े शिक्षण संस्थान व इंग्लिश मीडियम स्कूल का कोर्स शहर की किसी अन्य दुकान पर नहीं मिलेगा कमीशन खोरी के चलते स्कूलों द्वारा निर्धारित दुकानों पर ही कोर्स मिलेगा जिससे हर साल खरीदना अनिवार्य है। हर साल सिलेबस चेंज करने के पीछे निजी विद्यालय कमीशन खोरी के गोरख धंधे के लिए इस सिलेबस चेंज करते हैं अन्यथा 50 फीसदी बच्चे पुरानी किताबों से भी पढ़ाई कर सकते हैं।


 *अभिभावकों की जेबों पर डाका* 


स्कूल खुलते ही शिक्षा माफिया ने बच्चों के अभिभावक कि जेब पर डाका डालना शुरू कर दिया है। निजी विद्यालय के संचालकों द्वारा उनके मनचाहे कॉपी किताबें लेने के लिए अभिभावकों पर दबाव बनाया जा रहा है। इनमें इन सभी स्कूलों में नर्सरी से कक्षा 10 तक के बच्चों के लिए विशेष कर यूं कहें सेटिंग वाले की कॉपी किताबों पर ही प्रयोग किया जाता है। इन स्कूलों की शहर में करीब से करीब एक दर्जन से अधिक निजी विद्यालयों की किताबें मिलती हैं स्कूल में बुक्स की लिस्ट के साथ ही कौन सी दुकान से खरीदा जाना है। दुकान का नाम भी बता दिया जाता है इससे अंदाजा लगाया जाता है कि कमीशन के खेल का खेल खेला जा रहा है स्कूल बताते कौन सी दुकान से बुक्स खरीदनी है। नगर में संचालित स्कूल के संचालक कमीशन खोरी के खेल के लिए बुक्स शेलरों से मोटा कमीशन सेट करने के बाद अपने स्कूलों की बुक्स वहीं से नए शस्त्र की खरीदने को कहते हैं और अभिभावकों को बताते हैं। कि कौन सी दुकान से तुम्हें बुक्स फला दुकान पर ही मिलेगी अन्य किसी और दुकान पर नहीं मिलेगी ऐसा लगता है। कि खुलेआम डाल रहे अभिभावकों की जेब पर डाका।

हर कोर्स पर 50 से लेकर 60 प्रतिशत कमिश्नर का खेल खेला जाता है। इसके अलावा प्रत्येक कोर्स पर मन मानें ढंग से प्रिंट रेट अंकित किए जाते हैं कॉपी व किताबों को देखकर आप खुद भी अंदाज़ लगा सकते हैं की इसकी कीमत क्या होगी पर आपके अंदाज से दो गुनी कीमत स्टेशनरी पर दर्ज है। ऐसे में इंग्लिश मीडियम स्कूलों द्वारा खुलेआम अभिभावकों की जेब पर ढाका डाला जा रहा।


 *इंग्लिश मीडियम में पढ़ने वाले बच्चे पर हर साल एक लाख से 2 लाख रुपये खर्च* 


इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे पर हर साल एक एक से दो लाख का खर्च आता है और घर में ट्यूशन लगाना भी जरूरी है। ऐसे में सवाल यह उठना है कि बच्चों को शिक्षा करने में स्कूलों की भूमिका क्या है एक ही स्कूल में हर साल अवैध रूप से दाखिला करने शुल्क वसूलने और किताबें बेचने वाले यह स्कूल कही अपने मक़सद से तो नहीं भटक गए हैं।



 *चालाकी से बदल देते हैं किताबें*


निजी स्कूलों द्वारा शिक्षा की आड़ में कमीशन खोरी का कारोबार काफी पुराना है 50 से 60 प्रतिशत से अधिक मिलने वाले कमीशन के खेल में निजी स्कूल हर साल नए शस्त्र में किताबें बदल देते हैं।


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