कलेक्ट्रेटः लिपिकीय व्यवस्था पर उठे सवाल, प्रमुख सीटों पर वर्षों से काबिज हैं दागी

 कलेक्ट्रेटः लिपिकीय व्यवस्था पर उठे सवाल, प्रमुख सीटों पर वर्षों से काबिज हैं दागी



कमोवेश कुछ ऐसे ही स्थिति है तीनों तहसीलों की, कईयों की तो आसपास की प्रमुख सीटों पर गुजर गई पूरी नौकरी


जनप्रतिनिधि ने खोला कच्चा चिट्ठा, शासन से कार्यकाल और सम्पत्ति की जाँच कराने की मांग



फतेहपुर। सिस्टम और सेटिंग की दुरभि संधि के चलते व्यवस्था का मखौल बनाने में कलेक्ट्रेट समेत जनपद की तीनों तहसील कार्यालयों की मलाईदार सीटो पर काबिज कर्मचारी व्यवस्था में खलल का सबब बनते रहे हैं। डीएम व एसडीएम की आंखो के नीचे ये कर्मचारी नियमों की धज्जियां भी उडाते रहे हैं। या यू कहें कि जब कभी पटल परिवर्तन की स्थिति भी बनती है तो वह सिंडीकेट व्यवस्था के माफिक होती है, जो जहां है, वह अपने सिस्टम से आस-पास ही रहता है, जिसकी सेटिंग नहीं है, वह काम के बोझ तले न सिर्फ दबे हैं, बल्कि अपमान का घूट भी पीने को मजबूर होते हैं।

उल्लेखनीय है कि कलेक्ट्रेट और तहसील कार्यालयों की मलाईदार सीटों पर गु्रप बंदी के तहत कुछ विशेष सेटिंग वालों की वैसे तो हमेशा से तूती बोलती रही है, जिन पर लगाम अगर कोई लगा पाया तो सिर्फ और सिर्फ तत्कालीन जिलाधिकारी मो. मुस्तफा थे। उन्होंने लगभग सभी को इधर से उधर कर बड़ी कार्यवाही करते हुए बड़ा संदेश दिया था, किन्तु उनके बाद फिर कोई डीएम इन घाघ बाबुओं पर लगाम नहीं कस पाया। यह क्रम अभी भी बदस्तूर जारी है।अकेले कलेक्ट्रेट के बाबुओं पर नजर डालें तो मिलता है कि डीएम की आंख के नीचे कितना बड़ा खेल होता रहा है। वैसे तो कलेक्ट्रेट में जूनियर एवं सीनियर लिपिकों की संख्या आधा सैकड़ा के करीब है, जिनमें तमाम ऐसे हैं जिन्होंने सेटिंग-गेटिंग के चलते अपनी ज्यादातर नौकरी कुछ एक सीटो पर गुजार दी है। इनमें काफी चर्चित नाम हेमंत कुमार का प्रकाश में आया है, लिपिक हेमन्त डेढ दशक के करीब से कलेक्ट्रेट की मलाईदार सीटो पर कब्जा जमाकर अपना सिक्का चलाने के लिए चर्चित रहे हैं। वे लम्बे समय तक अपर=जिलाधिकारी के पेशकार रहे, फिर अल्पसमय के लिए रिकॉर्ड रूम गए और अब लम्बे समय से उप जिलाधिकारी के फौजदारी अहलमद हैं।

इसी कडी में एक और नाम रामबाबू का चर्चा में है, रामबाबू की नियुक्ति 1996 में हुई। तब से वे लगातार कलेक्ट्रेट में अपना सिक्का जमाए हैं। उनकी तैनाती अहेंजर (रिकॉर्ड रूम), राजस्व सहायक, एडीएम कोर्ट में अहलमद, खनिज विभाग में लम्बा अंतराल, फिर एडीएम के अहलमद और लगभग ढाई साल से एडीएम के पेशकार हैं। इनके सिस्टम का पूरा कलेक्ट्रेट लोहा मानता है।

एक अन्य नाम जो खासा चर्चा में रहा वह प्रदीप चंदेल का है। लिपिक के रुप में प्रदीप की नियुक्ति का हवाला 2007 का मिलता है। शुरुआत से ही तगड़ी जुगत में महारत हासिल होने से लगातार 12 वर्षों तक रिकॉर्ड रूम में रहे। कहते हैं कि एक शिकायत पर दैवीय आपदा सीट पर भेजे गए किंतु उच्चाधिकारियों पर ऐसा दबाव पड़ा कि 02 माह के अन्दर ही वापस रिकॉर्ड रूम में वापसी हो गई। उसके बाद प्रमोशन और मौजूदा समय में स्टाम्प लिपिक हैं।

लगभग 15 वर्षों से कलेक्ट्रेट में जमे दिनेश सोनी लगभग 12 वर्षों तक खनिज की बड़ी सीट का चार्ज पूरी रंगबाजी से अपने पास रखने के लिए काफी चर्चा में रहे हैं। तगड़ी सेटिंग के चलते उन पर समय-समय पर लगने वाले आरोपो को भी सहजता से झुठलाया जाता रहा है। लगभग तीन वर्ष तक नाजिर द्वितीय के पद पर रहे। अब वरिष्ठ लिपिक रिकॉर्ड रूम के पद पर हैं। एक मामले को लेकर उनका नाम काफी चर्चा में रहा लेकिन अंत्योगत्वा मामला दब गया।

तकरीबन 10 साल से कलेक्ट्रेट के कद्दावर लिपिकों में शामिल अंबरीश चन्द्र लम्बे समय से डीएम के अहलमद हैं, पूर्व में बिल बाबू के पद पर रहते इन पर लगे आरोपों को महत्व नहीं दिया गया, जो अभी भी चर्चा का विषय है।

नौकरी के लगभग पूरे 20 वर्ष कलेक्ट्रेट की मलाईदार सीटो में काबिज रहने वाले राम दयाल डीएम कोर्ट में अहलमद व पेशकार रहे। सेटिंग का आलम यह था कि ज्यादातर समय या अहेलमद रहे या पेशकार, यानी उन पर अधिकारियों की कृपा खूब बरसती रही। एएसडीएम के यहां उनकी पोस्ट तो अहलमद की है, किन्तु जनाब करते पेशकारी हैं।

1997 में मृतक आश्रित के रुप में कलेक्ट्रेट में नियुक्ति के बाद लिपिक मनीष श्रीवास्तव ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। किसी की मजाल भी नहीं हुई कि कोई उन्हें यहां से हिला ले। उनका कुछ समय रिकॉर्ड रूम में गुजरने के बाद वाद लिपिक, एडीएम के पेशकार व मौजूदा समय में एलबीसी के पद पर हैं।चर्चित लिपिकों में शामिल उर्मिला साहू 1998 से कलेक्ट्रेट के विभिन्न प्रमुख सीटों पर रही किन्तु कभी उन्हें भी तहसीलों की ओर रुख करने को नहीं कहा गया, क्यों नहीं कहा गया यह अपने आप में सोचनीय विषय है।

कलेक्ट्रेट में सेटिंग गेटिंग का आलम यह है कि दागी लिपिकों को भी महत्वपूर्ण (मलाईदार) सीटे देने में परहेज नहीं किया गया। उदाहरण के तौर पर मो. आसिफ का नाम लिया जाता है। उन पर कई बार गम्भीर आरोप लगे, कार्यवाही की जद में भी आए किंतु सीट प्रायः महत्वपूर्ण रही। 1990 में नियुक्ति के बाद आसिफ जहां-जहां रहे जमकर गुल खिलाया। खागा तहसील कार्यालय के बाद बिंदकी न्यायालय में आरोपित होने के बावजूद फिर खागा में प्रमुख सीट की जिम्मेंदारी, वहां फिर आरोपित होने के बावजूद सीधे यहां आयुध लिपिक द्वितीय की सीट की जिम्मेंदारी अपने आप में अचरज में डालने वाली है। इसके अतिरिक्त कलेक्ट्रेट के दो और चर्चित लिपिक राम किशोर साहू और राम प्रताप साहू का कार्यकाल भी निर्विवाद नही रहा है।

इसके अतिरिक्त कलेक्ट्रेट के मौजूदा प्रशासनिक अधिकारी उस्मान खां 1985 में नियुक्ति के बाद 1995 से लगातार कलेक्ट्रेट में ही रहे...!  बताते चलें कि मौजूदा समय में डीएम के स्टेनो लल्लू राम, एसडीएम सदर के स्टेनो मेवालाल केशकर व एसडीएम खागा के स्टेनो उमेश चन्द्र हैं। ये भी आरोपों से परे नहीं कहे जा सकते हैं! डीएम के स्टेनो लल्लू राम पर तत्कालीन डीएम आञ्जनेय कुमार सिंह के समय लगे आरोप तो चैंकाने वाले थे। उन पर बांके बिहारी मंदिर से सम्बन्धित एक महत्वपूर्ण पत्रावली की दिशा और दशा बदलने का भी आरोप है।

ख़बर है कि एक जनप्रतिनिधि ने सरकारी नौकरी के तृतीय संवर्ग के बारे में एक गोपनीय रिपोर्ट शासन को भेजी है, जिसकी प्रथम कड़ी में कलेक्ट्रेट व तीनों तहसील कार्यालयों के कर्मियों का विस्तार से हवाला देते हुए इनकी चल-अचल सम्पत्तियो की जांच करवाने की मांग की गई है।

इस पत्र में स्पष्ट कहा गया है कि नौकर शाह इन कर्मियों से पार नहीं पा पा रहे हैं। जनपद में लिपिकों की सेटिंग-गेटिंग एक बड़ी समस्या का सबब बताई गई है, जबकि तमाम लिपिकों का सिंडीकेट गुट द्वारा उत्पीड़न कराएं जानें की बात भी कही गई है।

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