प्रशासनिक उपेक्षा से कमला लाइब्रेरी हुई नाबूद, पहरूवों ने जमीन पर खड़ा कर दिया व्यावसायिक काम्प्लेक्स

 प्रशासनिक उपेक्षा से कमला लाइब्रेरी हुई नाबूद, पहरूवों ने जमीन पर खड़ा कर दिया व्यावसायिक काम्प्लेक्स



दान-अनुबंध तोड़ व्यावसायिक उपयोग करने का नगर पालिका पर उत्तराधिकारियों ने मढ़ा आरोप


पूर्व डीएम आंजनेय के प्रयास से हुआ अनुबंध भी पालिका ने डाला ठंडे बस्ते में


कमला लाइब्रेरी न बनी तो पूर्वजों की जमीन ले लेंगे वापस: प्रदीप श्रीवास्तव से.नि डीजीपी चंडीगढ़


1921 में बेटी की याद में रईस बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव ने करवाई थीं स्थापना


फतेहपुर। तक़रीबन 100 वर्ष पूर्व बेटी की याद में स्थापित कमला लाइब्रेरी एवं वाचनालय का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आने वाला है...! शहर के पाश ज्वालागंज इलाक़े में लगभग पौने दो बीघे भू-खण्ड पर स्थापित हुईं यह लाइब्रेरी इतिहास बन चुकी है और दूर दूर तक उसका कहीं अता पता नहीं है! इस भूखण्ड को पूरी तरह व्यवसायिक इलाक़े में तब्दील कर दिया गया है और मौजूदा समय में नगर पालिका परिषद इसमें सात दर्जन के क़रीब व्यवसायिक प्रतिष्ठानों का आवंटन कर चुका हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर क्यों अति उपयोगी संस्थान को अस्तित्वहीन कर भूखण्ड और उसकी इमारत का व्यवसाईकरण किया गया और इसके पीछे का उद्देश्य क्या था..!

यह कहना कतई गलत न होगा कि जैसे समय की इसको नज़र लग गई..., और कुत्सित मानसिकता वाले एक बडे़ एवं प्रतिष्ठित संस्था को निगल गए। इसको पार करने में माफिया भी पीछे नहीं रहे। कभी शहर की शान रहा कमला लाइब्रेरी एवं वाचनालय आज इतिहास बनने की दहलीज पर पहुंच गया है और यह कटु सत्य है कि इसके पुनरोद्धार में नगर पालिका ही सबसे बड़ा रोड़ा बनी हैं..?

 क्या इस महत्वपूर्ण तथ्य पर आसानी से विश्वास किया जा सकता है कि तत्कालीन जिलाधिकारी आञ्जनेय कुमार सिंह के एक और ड्रीम प्रोजेक्ट से सम्बंधित पत्रावली "इतिहास" बनने की दहलीज पर पहुंच गई हैं। 2017 में ज़िला जज के जिस आदेश पर नगर पालिका परिषद (फतेहपुर) ने उच्च न्यायालय से स्थगनादेश प्राप्त कर लिया था, उसमें दावा वापस लेकर उपरोक्त स्थान पर पुनः भव्य "कु. कमला लाइब्रेरी जिम्नेशियम" के निर्माण के बाबत चंडीगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रदीप श्रीवास्तव के साथ तत्कालीन उप जिलाधिकारी सदर प्रह्लाद सिंह द्वारा किए गए रजिस्टर्ड एग्रीमेंट का क्या हुआ, इसका जवाब किसी भी जिम्मेदार के पास नहीं है। हद है अंधेरगर्दी और खुदगर्जी की। सिस्टम को चरने वालों ने व्यवस्था का जैसे माखौल बना रखा है...!

उल्लेखनीय हैं कि फतेहपुर के जानें मानें रईस बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव ने 1921 में अपनी 16 वर्षीय बेटी कमला की अकाल मौत के बाद उसकी याद में शहर के रोड़वेज बस स्टाफ के सामने लगभग पौने दो बीघे भू-भाग में भव्य लाइब्रेरी एवं वाचनालय का निर्माण कराया और उसका नामकरण बेटी के नाम पर ("कु. कमला लाइब्रेरी एवं वाचनालय") किया।

बताते चलें कि उस ज़माने में बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव ज़िले की जानी मानी हस्ती हुआ करते थे। अंग्रेज़ी हुकूमत ने इनके पर दादा को "रईस" की पदवी से नवाजा था। क्योंकि नानक प्रसाद ने तत्कालीन कलेक्टर के अनुरोध पर "म्युनिसिपैलिटी" (मौजूदा नगर पालिका परिषद) के कार्यालय स्थापना के लिए अपनी 5.7 बीघा जमीन दान में दी थी और वह अनवरत लगभग तीन दशक तक इस प्रतिष्ठित संस्था के चेयरमैन भी रहे। उन्होंने भविष्य में इस लाइब्रेरी स्थल का दुरुपयोग न हो इसलिए म्युनिसिपैलिटी बोर्ड के साथ एक "मसौदा साइन" किया था, जिसमें स्पष्ट था कि म्युनिसिपैलिटी सार्वजनिक उपयोग के इस संस्थान (कमला लाइब्रेरी एवं वाचनालय स्थल एवं उससे जुड़े भू-भाग) की सिर्फ़ देख रेख करेंगी, इस स्थान का स्वामित्व सशर्त ही उसके पास रहेगा। निकट भविष्य में अगर म्युनिसिपैलिटी यानी नगर पालिका परिषद (फतेहपुर) इसके स्वरूप और उद्देश्य से छेड़छाड़ करने व दूसरे किसी उपयोग में लिया तो यह शर्तो का उल्लंघन माना जायेगा और इस समूचे भूभाग और इमारत का स्वामित्व उनके (नामक प्रसाद) परिवार के पास लौट जायेगा।

 1964 में बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव की मौत के बाद कु. कमला लाइब्रेरी एवं वाचनालय 1975 तक सलीके से अस्तित्व में रहा। बताते हैं कि 1975 के आस पास अनुबंध को दरकिनार कर नगर पालिका ने इस भू-भाग पर दुकानें बनाकर इसका व्यावसायिक उपयोग शुरु कर दिया जिससे लाइब्रेरी एवं वाचनालय के अस्तित्व हीन होने से नानक प्रसाद श्रीवास्तव के परिजन खासे कुपित हुए और 1980 में इसी परिवार की कुसुम रानी पत्नी सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव (प्रदीप श्रीवास्तव की मां) ने नगर पालिका द्वारा इसके व्यावसायिक उपयोग को कोर्ट में चुनौती दी। लगभग 37 वर्ष तक यह मुक़दमा सेशन कोर्ट में चला और फिर 2017 में ज़िला जज न्यायालय ने कुसुम रानी के दावे को स्वीकार करते हुए नगर पालिका परिषद को इस भू खण्ड एवं इमारत का व्यावसायिक उपयोग करने से रोकते हुए जगह ख़ाली करवाने का आदेश दिया।

डीजे कोर्ट से मुक़दमा हारने के बाद नगर पालिका परिषद ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने डीजे के आदेश पर रोक लगा दी, तब से मामला उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं। बता दें कि 2018 में विकास पुरुष के रुप में फतेहपुर के डीएम बनकर आए आञ्जनेय कुमार सिंह के संज्ञान में जब यह मामला आया तो उन्होंने पूरा मामला समझने के बाद स्व. नानक प्रसाद श्रीवास्तव के पोते एवं इस परिवार के एकलौते वारिस (यू.टी. कैडर के आईपीएस एवं चंडीगढ़ के पूर्व डीजीपी) प्रदीप श्रीवास्तव से दूरभाष पर संपर्क किया।

डीएम के ख़ास बुलावे पर प्रदीप फतेहपुर आए और डीएम से गहन लम्बी वार्ता के बाद 07 फ़रवरी 2019 को उप निबंधक कार्यालय (बैनामा), फतेहपुर में तत्कालीन उप जिलाधिकारी सदर प्रह्लाद सिंह के साथ एक रजिस्टर्ड एग्रीमेंट हुआ कि नगर पालिका परिषद हाईकोर्ट में अपना वाद (स्टे) वापस लेगा और ज़िला जज के आदेश पर प्रशासन कड़ाई से अमल करेगा।

उपरोक्त भू-खण्ड को खाली कराया जायेगा और उस स्थान पर पूर्ववत "कु. कमला लायब्रेरी जिम्नेशियम" को विस्तारित ढंग से स्थापित कराया जायेगा। प्रदीप श्रीवास्तव इस शर्त पर भू-भाग पर अपना दावा छोड़ने को राजी हुए कि फिर कभी इसके अस्तित्व से खिलवाड़ नहीं होगा और इस स्थान पर सिर्फ़ और सिर्फ़ कमला लायब्रेरी जिम्नेशियम ही रहेगा। इस मसौदे में एक कमेटी बनाने का भी निर्णय हुआ था, जिसमें ज़िला, सदर तहसील प्रशासन के अधिकारी, प्रदीप श्रीवास्तव व कुछ और लोगों को शामिल किया जाना था।

बताते हैं कि आञ्जनेय इस एग्रीमेंट पर अमल शुरु कराते इसके पहले ही उनका यहां से स्थानांतरण हो गया और उसके बाद आए अन्य अधिकारियों ने इस गम्भीर प्रकरण को संज्ञान में लेना भी मुनासिब नहीं समझा, वहीं नगर पालिका ने भी अपने वायदे पर अमल नहीं किया।

इस सन्दर्भ में इस परिवार के इकलौते वारिस आईपीएस प्रदीप श्रीवास्तव ने दूरभाष पर बताया कि उन्होंने "एक" रूपए में एग्रीमेंट किया था, किन्तु उनके साथ फिर धोखा हुआ। उन्होंने कहा कि निःसंदेह आञ्जनेय कुमार सिंह विलक्षण प्रतिभा वाले व्यक्ति थे। उन्होंने जो प्लान बनाया था, वह बेहतरीन था किन्तु उनके जानें के बाद मसौदे को दबा दिया गया है। बताया कि एग्रीमेंट में तत्कालीन डीजीसी (सिविल) संतोष कुमार साहू एवं डीजीसी (रेवन्यु) सूघर यादव बाकायदे गवाह हैं और नगर पालिका परिषद के तत्कालीन ईओ (मौजूदा एसडीएम) प्रमोद कुमार झा, वरिष्ठ अधिवक्ता देवेश त्रिपाठी उर्फ़ सप्पू आदि मौजूद रहें।

उन्होंने कहा कि यह एग्रीमेंट मेरी बुआ की यादों से जुड़ा है, इस संस्था को उनके बाबा द्वय नानक प्रसाद श्रीवास्तव व कामता प्रसाद श्रीवास्तव ने स्थापित कराया था, वह इस एग्रीमेंट की शर्तो पर आज भी अमल को तैयार हैं, किन्तु नगर पालिका परिषद पर विश्वास नहीं है! कोई प्रशासनिक अधिकारी ज़िम्मेदारी ले, वहां से दुकानें हटाई जाए और कमला लायब्रेरी जिम्नेशियम फ़िर से अस्तित्व में आए तो वह अपना दावा वापस लेने को तैयार हैं, किन्तु मौजूदा स्वरूप एक धोखा है, इसका वह विरोध करते रहेंगे। उन्होंने बताया कि वह जल्द ही इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने जा रहे हैं और उच्च न्यायालय में स्टे वैकेट कराने के बाबत सक्रियता बढ़ाएंगे...! बड़ी बात यह है कि लगभग 100 साल पहले इस बड़ी सोच वाली स्थापना के पीछे इस प्रतिष्ठित परिवार की सोच कितनी बेहतर और उच्च स्तर की रही होगी। जिसे बदलते परिवेश में लाभ और माफियाई मानसिकता ने रसातल में पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी!उन्होंने बताया कि भूमि नानक प्रसाद और कामता प्रसाद ने लाइब्रेरी बनाने के लिए ही यह ज़मीन दान दी थी। 1921 के अनुबंध में साफ-साफ लिखा है कि यदि भूमि का उपयोग लाइब्रेरी के अलावा किसी भी और कार्य के लिए होगा तो भूमि परिवार को वापस चली जायेगी...! अब देखने वाली बात यह होगी कि जनपद की यह महत्वपूर्ण सार्वजनिक धरोहर (कमला लाइब्रेरी एवं वाचनालय) अपने अस्तित्व में आ पाती है या सिस्टम और चंद भू माफियाओं का निवाला बन इतिहास बन कर रह जाती है।

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