कानपुर को स्वाद की सौगात देने वाले ‘ठग्गू के लड्डू’ के मालिक प्रकाश पाण्डेय नहीं रहे

 कानपुर को स्वाद की सौगात देने वाले ‘ठग्गू के लड्डू’ के मालिक प्रकाश पाण्डेय नहीं रहे



कानपुर। स्वाद की सौगात देने वाले ‘ठग्गू के लड्डू’ के मालिक प्रकाश पाण्डेय नहीं रहे।लेकिन वह शहर को एक ऐसी मिठास देकर गए हैं जिसकी शान में कसीदे पढ़े जाते हैं।

चाहे भगवान को प्रसाद चढ़ाना हो, किसी का स्वागत-सत्कार करना हो या कोई उत्सव हो, लड्डू के बिना यह सब अधूरा रह जाता था. आज के जमाने में भी भगवान को भोग लगाने से लेकर शादी-ब्याह की हर रस्म लड्डू के बिना अधूरी है. अगर हम लड्डू की बात करें तो जुबां पर कानपुर के ठग्गू के लड्डू का नाम आता है. यहां के लड्डूओं के दीवाने अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन भी हैं।

50 साल से ज्यादा पुरानी है दुकान

ठग्गू की लड्डू की दुकान करीब 50 साल पुरानी है. यह दुकान प्रकाश पाण्डेय के पिता रामऔतार पांडेय ने खोली थी. उन्होंने ही इस दुकान का नामकरण किया. इस दुकान में मिलने वाले लड्डू पूरी तरह से देशी होते हैं. इसमें देशी आयटम मिक्स रहते हैं. इसे सूजी, खोया, गोंद ,चीनी ,काजू ,इलायची बादाम ,पिस्ता से तैयार किया जाता है. ये दुकान इसलिए भी खास है क्योंकि यहां पर लड्डू बनाकर स्टोर नही किए जाते हैं. जितना भी लड्डू बनता है वो रोजाना बिक जाता है। इस दुकान के बाहर मिलती है बदनाम कुल्फी, इसका नाम भी अजीब है और इसकी टैगलाइन. भले ही इसका नाम बदनाम हो पर ये लोगों की जुबां पर चढ़ जाती है. टैग लाइन- मेहमान को चखाना नहीं टिक जाएगा, चखते ही जेब और जुबां की गर्मी हो जाएगी गायब. केसर पिस्ता की कुल्फी जमाई नहीं जाती है बल्कि नमक और बर्फ के बीच हैंड जर्न की जाती है जिससे इसका टेस्ट और टैक्चर फ्रोजन कुल्फी जैसा होता. ये शुद्ध दूध से बनाई जाती है।

‘ठग्गू के लड्डू’ की दुकान के मालिक प्रकाश पांडेय का मानना था बदनाम वही होता है, जिसका नाम होता है। बदनामी उसी की होती है, जो फुटपाथ पर बिकती है। महलों में बिकने वाले बदनाम नहीं होती। यही खासियत है उनकी कुल्फी की। इसके लिए उनकी दुकान पर दूर-दराज से ग्राहक आते हैं और बड़े चाव से इसका स्वाद लेते हैं। उनके पिता का एक स्लोगन सबसे ज्यादा चर्चित हुआ वह है “ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं”। मिठाई हो या कुल्फी स्वाद के मामले में पूरे शहर में इसका कोई जोड़ नही। खानेवालों के पेट भरते नही और वे उंगलियां चाटते थकते नहीं।

पाण्डेय जी के मित्र एडवोकेट संदीप शुक्ला बताते है कि उनके मित्र आदर्शों पर चलने वाले थे। उनको गांधी जी की बात याद थी कि शक्कर मीठा जहर है और लड्डू व कुल्फी में शक्कर का भरपूर उपयोग होता है। उन्होंने धंधे में इसे बेईमानी माना और अपने आप को ठग्गू  कहना शुरू कर दिया।

‘ठग्गू के लड्डू’ और ‘बदनाम कुल्फी’ का स्वाद हर जगह मशहूर है। जितनी लोकप्रियता इस दुकान की है, उतना ही आकर्षक है इसका साइन बोर्ड। फिल्म बंटी-बबली का ‘ऐसा कोई सगा नहीं, जिसको हमने ठगा नहीं’ गाना आपने जरूर सुना होगा। आपको जानकार हैरानी होगी कि इसके बोल कानपुर के एक मशहूर लड्डू के दुकान की थीम से लिए गए हैं। बंटी-बबली यानि अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी ने भी यहां के लड्डू का स्वाद चखा था।