ऐतिहासिक होता है खजुहा की रामलीला व मेला

 ऐतिहासिक होता है खजुहा की रामलीला व मेला



527 साल पुरानी परंपरा आज भी कायम


21 अक्टूबर को निकलेगी भव्य शोभायात्रा 22 को राम रावण युद्ध


इस मेले में वास्तव में मेघनाथ द्वारा अश्वमेघ शक्ति का प्रयोग करने के पश्चात लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं


गिरिराज शुक्ला

बिंदकी फतेहपुर

प्रदेश में प्रसिद्ध खजुहा कस्बे का ऐतिहासिक मेला वैसे तो विजयादशमी के दिन से गणेश पूजन के पश्चात शुरू हो जाता है विधि विधान से यहां मेला का शुभारंभ एवं समापन होता है 21 अक्टूबर दिन बृहस्पतिवार को शोभायात्रा निकलेगी और 22 अक्टूबर दिन शुक्रवार को राम रावण के बीच युद्ध होगा। यहां की रामलीला एवं मेला 527 वर्ष पुरानी परंपरा के मुताबिक आज भी होता चला आ रहा है। यह रामनगर बनारस के सामान पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। जो भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तीजा से प्रारंभ होकर कातिक पक्ष की सप्तमी से समाप्त होता है। एक माह तक कुशल कारीगरों द्वारा कास्ट एवं तिनरही आदि से विशालकाय रावण एवं रामदल स्वरूपों का निर्माण किया जाता है विजयादशमी से 10 दिनों तक चलने वाला यह मेला विभिन्न कल्पित स्थानों जैसे पंचवटी चित्रकूट शबरी आश्रम किष्किंधा पर्वत अशोक वाटिका सेतबंध रामेश्वर तथा लंका से समाप्त होता है।

यहां शोभायात्रा के दिन रावण की विधि विधान से श्री राम जानकी पंचायती मंदिर के पुजारी एवं मंदिर के प्रबंधक आदि हजारा आरती करते हैं यह पुरानी परंपरा आज भी चली आ रही है जिस दिन से मेले की गणेश पूजन के साथ शुरुआत होती है मंदिर के पुजारी व्रत रखते हैं रावण वध के पश्चात सरजू स्नान के साथ रावण की तेरहवी मे ब्रह्मभोज भी कराया जाता है। परंतु अब कुछ प्रशासन जागा है इस कस्बे को पर्यटक स्थल घोषित किया गया है बिंदकी तहसील से लगभग 7 किलो मीटर मुगल रोड आगरा मार्ग पर स्थित खजुहा कस्बे में दो विशालकाय फाटक व सराय आज भी इसकी बुलंदियां बयां करती हैं। मुगल रोड के उत्तर में तीन राम जानकी मंदिर तथा तीन विशालकाय शिवालय हैं। दक्षिण में छिनमस्तिष्क मां पनथेेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर व बंसीवाला मठ भूरा बाबा की समाधि स्थल है। बड़ी बाजार में तीन राधा कृष्ण मंदिर हैं इस प्राचीन संस्कृतिक  नगरी में 118 छोटे-बड़े शिवालय मंदिर तथा इतने ही कुएं हैं। चार विशालकाय तालाब इस नगरी के चारों दिशाओं में शोभायमान हैं। जो इश्क नगर के सवणियम युग की याद दिलाते हैं। गौरतलब है कि तांबे का यह रावण का सिर पहले तो मंदिर के चबूतरे पर ही रखा रहता था कई बार चोरों ने उसे ले जाने की योजना बनाई परंतु सर को टस से मस नहीं कर सके। मुगल शासन काल से लगने वाले इस मेले में रावण के रथ का वजन लगभग 70 कुंतल वजनी होता है। जो 30 फुट की ऊंचाई मे बनी लंका में रस्सो के जरिए लगभग आधा सैकड़ा लोग चढ़ाते हैं शोभायात्रा के उपरांत रावण की हजारादीप वाले हजारा आरती होती है इस दिन मुगल मार्ग जाम रहता है मेला ग्राउंड में चारों और बड़े-बड़े टीले बने हुए हैं दर्शक वहीं से बैठकर मेला का लुफ्त उठाते रहते हैं इस मेले की विशेष महत्व है जो कि इतिहास के पन्नों में इसका प्रमाण छुपा है।

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