सिद्धपीठ बांके बिहारी मंदिर के अस्तित्व पर गहराया संकट

 सिद्धपीठ बांके बिहारी मंदिर के अस्तित्व पर गहराया संकट



तीन वर्ष गुजरने के बाद भी अलौकिक मूर्तियों को है प्राणप्रतिष्ठा का इंतजार


जिम्मेदारों की उपेक्षा के चलते नहीं बन पा रहीं योजना


और जब सत्तापक्ष के मुकाबले एक बसपाई को ज़िम्मेदारी सौंपने को मजबूर हो गए थे आञ्जनेय


फतेहपुर। यूं ही कोई प्रासंगिक नहीं हो जाता...! क्या इस तथ्य पर आसानी से विश्वास किया जा सकता है कि 2018 के मध्य में जनपद की कमान संभालने वाले तत्कालीन जिलाधिकारी आञ्जनेय कुमार सिंह को जिले में तक़रीबन 15 लाख के भाजपाई कुनबे में एक भी उस कद का चेहरा नहीं दिखा जो आगे बढ़कर सिद्ध "श्री बांके बिहारी मंदिर" के जीर्णोद्धार महामिशन की ज़िम्मेदारी का निर्वाहन करने की हैसियत में होता, ऐसे में गैर भाजपाई चेहरे प्रदीप गर्ग (वरिष्ठ बसपा नेता) पर उनकी निर्भरता मजबूरी भी कही जा सकती है...!  यह अलग बात है कि इस वास्तविकता से सत्तारूढ़ दल की मदमस्त सेहत पर कोई असर न पड़ता हो, किन्तु इस सिद्ध पीठ का जब भी इतिहास लिखा जायेगा, उसमे मंदिर मुद्दे के कर्णधारों को अपमानजनक टिप्पणियों से अवश्य दो-चार होना ही पड़ेगा।

कहते हैं इतिहास में वहीं अमर होता है जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी मौजूदगी का सलीके से अहसास कराने में सफल होता है। यह दावे से कहा़ जा सकता है कि कम से कम बांके बिहारी मंदिर के जीर्णोद्धार मसले पर भाजपाई पूरी तरह असफल रहे और बसपाई प्रदीप गर्ग ने अपने हुनर लोहा मनवा लिया! बताते चलें कि ज़िले में अपने कार्यकाल के प्रारम्भ में ही तत्कालीन डीएम आञ्जनेय कुमार सिंह ने ईश्वरीय प्रेरणा से 1730 में स्थापित बांके बिहारी विराजमान मंदिर को भव्य स्वरुप देने का संकल्प लिया तो सबसे बड़ी चुनौती इस बात की सामने थी, कि इस महामिशन को पूर्ण करने के लिए जिम्मेदारी किसको सौंपी जाएं। विषय आर्थिक संसाधन जुटाने का नहीं था, संदर्भ था किस पर विश्वास किया जाएं...! सूत्र बताते हैं कि आञ्जनेय ने अपना पूरा तन्त्र लगाकर सत्तारूढ़ दल भाजपा के अंदर से कोई चेहरा ढूढने का प्रयास किया किंतु सत्ता मद में डूबे भाजपाई कुनबे में से कोई भी उपयोगी सिद्ध नहीं हुआ।

बताते हैं कि ऐसे में तत्कालीन अपर जिलाधिकारी जेपी गुप्ता ने आञ्जनेय को वरिष्ठ बसपा नेता प्रदीप गर्ग का नाम सुझाया, वैसे किसी माध्यम से आञ्जनेय ने व्यापारी नेता सुनील शुक्ला को ढूंढ लिया था और उन्हें काफ़ी कुछ शुरुआती जिम्मेदारियां भी सौप दी गई थी किन्तु जेपी आदि के दबावपूर्ण सुझाव के बाद अंत्योगत्वा बसपाई प्रदीप गर्ग की इस महामिशन में इंट्री हो गई...! कहते हैं कि देखते ही देखते सारा तन्त्र यहां तक कि जिम्मेदारों पर भी गर्ग का ऐसा रंग चढ़ा कि यह महामिशन उन्हीं के इर्द गिर्द घूमने लगा...! इसी बीच आञ्जनेय के तबादले के बाद एक ही झटके में सुनील शुक्ला आदि को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और मनमाने ढंग से एक नई पटकथा लिखी जानें लगी। यहां पर यह सोचने वाला विषय है कि क्या भाजपा का आध्यात्मिक एजेंडा सिर्फ़ राम मंदिर तक सीमित होकर रह गया है, अति प्राचीन बांके बिहारी मंदिर जैसे मामलों से अब उनका कोई सरोकार नहीं रहा। सवाल यह उठता है कि जब एक आईएएस एक मंदिर के लिए लगभग तीन साल से पूरी शिद्दत से समर्पित है तो भाजपाई क्यों नहीं, सवाल यह भी बड़ा है कि जब आर्थिक संसाधन जुटाने का कोई सिरदर्द ही नहीं था, तो भी सत्तारूढ़ दल ने दिलचस्पी क्यों नहीं दिखाई...! बांके बिहारी के अनन्य भक्त एवं मंदिर के जीर्णोद्धार के शुरुआती महामिशन में अहम भूमिका अदा करने वालों का कहना है कि इस मंदिर का जो नक्शा आञ्जनेय ने बनवाया था, उससे इतर निर्माण होने से यह महामिशन आञ्जनेय की सोच के मुताबिक़ अमल में नहीं आ पाया। यह भी कहते हैं कि मन्दिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने निर्माण हो जानें से इस सिद्ध आध्यात्मिक पीठ की आभा कम हुई है। आञ्जनेय द्वारा बनवाए गए नक्शे के मुताबिक कही से निर्माण नहीं लगाता।

कई बिन्दु जो अनबुझी पहेली बने हैं, उनमें से कुछ तो प्रायः आम चर्चा का विषय आज भी बने हुए हैं। सरकारी नियंत्रण वाली इस सिद्धपीठ की मूर्तियो को कलाहरण पद्धति से अपने स्थान से हटाएं जानें के बाद मंदिर का निर्माण पूर्ण हो जानें पर भी उनकी प्राण प्रतिष्ठा क्यों नहीं करवाई गई। इस सरकारी ट्रस्ट के समिति गठन में इतना विलंब क्यों।

निःसंदेह प्रदीप गर्ग के इस मद में प्रयास सराहनीय रहे हैं, किन्तु बगैर सरकारी अनुमति के मंदिर परिसर में अन्य निर्माण के लिए जिम्मेदार कौन। मंदिर के मुख्य गुम्मद के निर्माण के लिए महाराष्ट्र से बुलाए गए शिल्पकार मस्के बंधु (गोपालराव पांडूरंग मस्के) को मंदिर का सरकारी खाता संचालित होने के बावजूद दी गईं निजी खाते की चेक के डिसआनर होने के बाद उसे भुगतान क्यों नहीं किया गया। आख़िर क्यों मंदिर का अवशेष निर्माण नहीं हो पा रहा है। तालाब आदि के सुंदरीकरण में कौन सी बाधा है, जिससे प्रशासन को भी जूझना पड़ रहा है...! सवाल यह भी बनता है कि भूमि पूजन से लेकर महत्वपूर्ण आयोजनों से सत्तारूढ दल के लोगों की दूरी का राज क्या है। आञ्जनेय के बाद यहां के डीएम बने संजीव कुमार तो इस मद में गम्भीर नहीं रहे किन्तु मौजूदा डीएम श्रीमती अपूर्वा दुबे ने पिछले दिनों जब बांके बिहारी की पालकी उठाई तो एक भी भाजपाई का मौजूद न रहना इस बात का द्योतक हैं कि राम मंदिर के अलावा अन्य मंदिरों से भाजपाइयों का जैसे कोई सरोकार ही नहीं है।

भरोसेमंद सूत्रों के अनुसार अगले कुछ हफ्तों में प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हाथों बांके बिहारी मंदिर की मूर्तियों की प्राणप्रतिष्ठा हो सकती है, इस बारे में भाजपाइयों को कोई ख़बर नहीं है, किन्तु सवाल फिर बनता है कि जब मंदिर के जीर्णोद्धार की ज़िम्मेदारी लेने कोई भाजपाई आगे नहीं आया और एक बसपाई ने तत्कालीन डीएम के संकल्प को पूरा करने का बीड़ा उठाया तो मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा भाजपाई सीएम से ही क्यों, बसपाई पूर्व सीएम मायावती से क्यों नहीं।

गम्भीर विषय है कि सैकड़ों वर्ष पुराने इस सिद्ध पीठ की मूर्तियां आज भी अपने प्राण प्रतिष्ठित होने की बाट जोह रही है किन्तु अभी दूर दूर तक ऐसे किसी आयोजन की सुगबुगाहट तक नहीं है।कुल मिलाकर अलौकिक सिद्धपीठ का अस्तित्व संकट में है। एक आईएएस का आध्यात्मिक संकल्प मूर्त रुप कब तक ले पाता है यह तो समय के गर्भ में है किन्तु इतिहास सत्तारूढ दल के जिम्मेदारों को कुछ उनकी भी जिम्मेदारी बनती थीं, इसके लिए धिक्कारेगा ज़रूर।