सप्तमी तिथि पर इस विधि व मंत्र से करें देवी कालरात्रि की पूजा, ये हैं इस दिन के शुभ मुहूर्त

 सप्तमी तिथि पर इस विधि व मंत्र से करें देवी कालरात्रि की पूजा, ये हैं इस दिन के शुभ मुहूर्त



अजय प्रताप।

महाशक्ति मां दुर्गा का सातवां स्वरूप है कालरात्रि । मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। नवरात्रि  के सातवें दिन (12 अक्टूबर, मंगलवार) मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि की भक्ति से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती हैं।


 मां कालरात्रि की भक्ति से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती हैं।


12 अक्टूबर के शुभ मुहूर्त 

सुबह 9 से 10.30 तक- चर

सुबह 10.30 से दोपहर 12 तक- लाभ

दोपहर 12 से 1.30 तक- अमृत

दोपहर 3 से 4.30 तक- शुभ

पूजा विधि

- सबसे पहले चौकी (बाजोट) पर माता कालरात्रि ( की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें।

- उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका ( सप्त घृत मातृका(सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें। इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा माता कालरात्रि सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें।

- इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।


ध्यान मंत्र

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।

लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी॥

वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।

वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी॥


मां कालरात्रि  की आरती

कालरात्रि जय-जय-महाकाली। काल के मुह से बचाने वाली॥

दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा। महाचंडी तेरा अवतार॥

पृथ्वी और आकाश पे सारा। महाकाली है तेरा पसारा॥

खडग खप्पर रखने वाली। दुष्टों का लहू चखने वाली॥

कलकत्ता स्थान तुम्हारा। सब जगह देखूं तेरा नजारा॥

सभी देवता सब नर-नारी। गावें स्तुति सभी तुम्हारी॥

रक्तदंता और अन्नपूर्णा। कृपा करे तो कोई भी दुःख ना॥

ना कोई चिंता रहे बीमारी। ना कोई गम ना संकट भारी॥

उस पर कभी कष्ट ना आवें। महाकाली माँ जिसे बचाबे॥

तू भी भक्त प्रेम से कह। कालरात्रि माँ तेरी जय॥

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