राजकीय महाविद्यालयों में प्रोफ़ेसरों के ग़ायब रहने से गिर रहा शिक्षा क़ा स्तर

 राजकीय महाविद्यालयों में प्रोफ़ेसरों के ग़ायब रहने से गिर रहा शिक्षा क़ा स्तर



प्रायः ग़ायब रहता है राजकीय महाविद्यालय बहुआ देहात क़ा शैक्षणिक स्टाफ़


जनपद में उच्च शिक्षा का स्तर भी लगा गड़बड़ाने


बजट के बंदरबाट क़ा भी लग रहा रहा आरोप


प्रोफ़ेसरों के ग़ायब रहने क़े बावजूद लगती है नियमित हाज़िरी, भारी-भरकम बजट क़े बावजूद नहीं निकल रहे सकारात्मक परिणाम


मौजूदा शैक्षणिक सत्र में 100 क़ा आँकड़ा भी नहीं छू पाया राजकीय महाविद्यालय बहुआ देहात

             

फ़तेहपुर। जनपद के तीनो राजकीय महाविद्यालयों में प्रोफ़ेसरों के आए दिन ग़ायब रहने से उच्च शिक्षा का स्तर भी गड़बड़ाने लगा है। इन महाविद्यालयों के बेहतर ढंग से संचालन में सरकार भारी-भारी बजट एवं वेतन ख़र्च तो करती है किन्तु सकारात्मक परिणाम नहीं मिल रहे है। नतीजन निजी डिग्री कालेजों क़ी ओर रुख़ करना छात्र/छात्राओं एवं उनके अभिभावको क़ी विवशता भी कहीं जा सकती है। सरकारी डिग्री कालेजों में शिक्षा का स्तर योगी सरकार में ज़्यादा गिरने क़ा हवाला मिलता है।

वैसे तों सरकारी डिग्री कालेजों में शिक्षा का स्तर गिरने के कई कारण माने जाते रहे है, किन्तु सबसे बड़ा कारण शैक्षणिक स्टाफ़ क़ी मटरगस्ती रही है। इन कालेजों में प्रायः प्रोफ़ेसर ग़ायब रहते है, बावजूद इसके इनकी अटेंनेस रेगुलर लगती है…! बड़ी बात यह है कि हफ़्ते में एक़-दो दिन आने वाले प्रोफ़ेसर क्लास भी नहीं लेते…! राजकीय महाविद्यालय बहुआ देहात क़ी स्थिति कुछ ज़्यादा ख़राब बताईं जाती है। मौजूदा सत्र में यहाँ पर बीए, बीएससी और बीकाम में 100 क़ा आँकड़ा भी नहीं पार हो सका है। यहाँ पर शिक्षारत छात्र/छात्राओ क़ोक उच्च स्तरीय शिक्षा देने के लिए फ़िलहाल 09 प्रोफ़ेसर सेवारत है, ज़ो कब आते है और कब चले जाते है किसी क़ो नहीं मालूम।

राजकीय महाविद्यालय बहुआ देहात क़े संचालन क़ी व्यवस्था फ़िलहाल प्रभारी प्राचार्य डा. रिचा रस्तोगी क़े कंधो पर है, किन्तु उनका आलम यह है कि वे हफ़्ते में एक़-दो दिन ही कालेज आती हैं…! वे प्रयागराज से आवागमन करती है। प्रभारी प्राचार्य क़े नक़्शे क़दम पर यहाँ क़े अन्य प्रोफ़ेसर भी चलते है। प्रोफ़ेसर डा. मधुलिका श्रीवास्तव क़ा कालेज जाने क़ा औसत हफ़्ते में दो से तीन दिन क़ा है। इसी तरह अलताफ़ आलम कानपुर से हफ़्ते में औसतन दो दिन आते है। राहुल दुबे व विशाल कुमार गुप्ता कालेज परिसर में ही रहते है, बावजूद इसके वे भी रोज़ाना क्लास नहीं लेते…!इसी कड़ी में अंबेश्वरी कुमार पाण्डेय जनपद मुख्यालय (फ़तेहपुर) में रहते है, बावजूद इसके 17 किलोमीटर क़ा सफ़र वे हफ़्ते में दो दिन भी बमुश्किल तय कर पाते है। इसी तरह प्रीती चौधरी प्रयागराज से हफ़्ते में दो-तीन दिन कालेज पहुँचती है और जब कालेज में होती भी है तों क्लास लेने में जैसे अपनी तौहीन समझती है…! डा. वीरेन्द्र सिंह कुशवाहा क़ा मूल निवास कानपुर है और उनका कालेज आने क़ा औसत एक़ या दो दिन ही है! अंकित श्रीवास्तव लालगंज (रायबरेली) भी बमुश्किल दो-तीन दिन ही कालेज पहुँचते है। 

सबसे बड़ी बात यह है कि जब ये प्रोफ़ेसर कालेज आते भी है तो क्लास नहीं लेते। प्रभारी प्राचार्य डा. रिचा रस्तोगी ने अंतिम बार क्लास कब ली किसी क़ो याद नहीं है…! जब बड़े-बड़े घर बैठें साल से लाखों रुपए पगार उठा रहे है तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी राम सिंह क्यों पीछे रहते वह भी दो-दो, तीन-तीन दिन तक ग़ायब रहते है।भरोसेमन्द सूत्रों क़े अनुसार राजकीय महाविद्यालय बहुआ देहात क़े रख-रखाव एवं अन्य मद में सरकार से प्रति वर्ष मोटा बजट प्राप्त होता है किन्तु उसमें भी ख़ेल हों जाता है। बजट क़ा सदुपयोग न होने से यहाँ मूलभूत समस्याएँ प्रायः मुँह बाए खड़ी रहती हैं। सवाल यह उठता है कि इस अंधेरगर्दी क़े लिये आख़िर ज़िम्मेदार कौन है और यह दौर कब तक ज़ारी रहेगा…! महाविद्यालय परिसर क़े इस समय हालात बद से बदतर हालत में पहुँच गये हैं। मैदान में बड़ी बड़ी घास, झाड़ यहाँ क़ी स्थिति क़ो बया करती है। विगत जुलाई माह में वन महोत्सव क़े दौरान लगाए गये पौधों क़ा क़ही अता-पता नहीं है।

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