जहाँ तालाब में बैठी है माता गँगा, एक अलौकिक सिद्धपीठ की अजब कहानी....

 जहाँ तालाब में बैठी है माता गँगा, एक अलौकिक सिद्धपीठ की अजब कहानी.... 



-रहीस बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव ने 1730 में स्थापित कराया था श्रीबाँके बिहारी जी विराजमान मंदिर 


- 05 वर्ष की आयु में वर्ष 1760 में सिद्धपीठ से जुड़े थे नारायण दास


-नानक प्रसाद ने स्थापित की थी बाँकेबिहारी व राधारानी की अष्टधातु मूर्तियाँ


-पौने दो सौ वर्ष बाद नानक के आईएएस परपोते प्रदीप राय ने स्थापित करवाई राम, सीता व लक्ष्मण की अष्टधातु मूर्तियाँ


-1995 में अंतिम महंत रामचंद्र दास ने सरकार (तत्कालीन डीएम प्रभात कुमार) के नाम कर दी ट्रस्ट डीड


-एक ऐसा आध्यात्मिक स्थल जिसकी पौराणिकता के साथ इतिहासकारो ने नहीं किया न्याय

-ऐसा देवस्थान जहाँ अंग्रेजी अफसर भी टेकते थे माथा


(प्रमोद श्रीवास्तव)


फतेहपुर। देश के सिद्धपीठों का जब-जब जिक्र होगा और इतिहास लिखा जायेगा तो फतेहपुर के “श्रीबाँके बिहारी जी विराजमान मन्दिर” का नाम शामिल करना इतिहासकारों की विवशता होगी! यह अलग बात है कि तकरीबन तीन सौ वर्ष पुराने इस ऐतिहासिक देव स्थान के महात्म और इतिहास के साथ इतिहासकारों ने अब तक न्याय नहीं किया और आध्यात्मित स्थलों की फेहरिस्त में अपेक्षित स्थान भी नहीं मिला, बावजूद इसके इस सिद्धपीठ से जुडा महात्म किसी परिचय को मोहताज नहीं है। निःसंदेह पिछले कुछ दशक इस मंदिर की ख्याति पर बट्टा लगाने वाले रहे और कुत्सित मानसिकता वाले ग्रहण बने किंतु तकरीबन एक वर्ष पूर्व फतेहपुर के तत्कालीन डीएम आँजनेय कुमार सिंह ने इसके महात्म को समझा और इसे राष्ट्रीय पटल पर स्थापित कराने का बीड़ा उठाते हुए इसके कायाकल्प का महामिशन शुरू किया। बगैर किसी सरकारी धन का प्रयोग किये गैर प्रशासनिक स्त्रोतों और स्वयं तथा जनमानस के सहयोग से करोड़ों की लागत से इसको भव्य स्वरुप देने की जो शुरुआत की वह क्रम अभी भी जारी है किन्तु हाल के माहों में इसके निर्माण की गति कुछ मंद अवश्य पड़ी है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी शुरू हो गया है। बावजूद इसके यहाँ से जाने के बाद भी आँजनेय की इस मंदिर को लेकर आस्था कम नहीं हुई है! 

   उल्लेखनीय है कि उत्तर भारत के सिद्ध पीठों में सुमार “श्रीबाँके बिहारी जी का मन्दिर” जिसे श्रीश्री 108 महंत नारायणदास कुटी के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापना 1730 में फतेहपुर शहर के चंदियाना मोहल्ला निवासी “रहीस बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव” ने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन बाँकेबिहारी (कृष्ण) व राधारानी की अष्टधातु की मूर्तियाँ स्थापित करके की थी। मंदिर की स्थापना के समय इसका परिक्षेत्र 14 बीघे 07 बिस्वा का था। यह जमीन उन्होंने मंदिर को दान दी थी। प्रारम्भ में ज्वालागंज से मंदिर तक 11 मीटर चैड़ी अलग से पगडंडी थी जिसका जिक्र मंदिर के पुराने नक्शे में भी मिलता है। कभी इस पगडंडी से मंदिर तक भव्य मेला भी लगता था और यहाँ की रामलीला की ख्याति दूर-दूर तक थी। जो बदलते समय की भेंट चढ़ गई! बताते है कि भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त नानक प्रसाद श्रीवास्तव स्वयं व उनके परिजन लगभग 30 वर्षों तक इस मन्दिर की देखरेख व पूजा अर्चना करते रहे। 

जानकार बताते है कि 1760 में लगभग पाँच वर्ष आयु का एक घुमन्तू बालक भटकते-भटकते मंदिर परिसर पहुँचा और नानक प्रसाद जी से बाँकेबिहारी की सेवा करने का अवसर देने की गुजारिश की। उन्होंने इस बालक को मंदिर में रहने की अनुमति दे दी और कुछ ही दिनो में वे इस बालक से इतना प्रभावित हो गये कि न सिर्फ मंदिर की देखभाल अपितु पूजा-पाठ की सम्पूर्ण जिम्मेदारी भी उसे ही सौंप दी। ये बालक आगे चलकर श्रीश्री 108 महंत नारायणदास जी महाराज के नाम से विख्यात हुआ। नारायणदास कहां के रहने वाले थे और कहां से आये थे इसके बारे में किसी को कुछ भी पता नहीं है। नारायणदास के बारे में कहा जाता है कि अनवरत 89 वर्षों तक वे रोजाना सुबह 05 बजे मंदिर से पतित पावनी उत्तर वाहिनी गंगा के भिटौरा तट जाते और गंगाजल लेकर ठीक 06 बजे एक घण्टे के अंदर लौटकर अपने आराध्य देव बाँकेबिहारी को स्नान कराते रहे। कहते है कि उन्हें सिर्फ मंदिर से निकलते और मंदिर में लौटते ही भक्तों ने देखा। मंदिर से भिटौरा तक लगभग 24 किलोमीटर के आवागमन के दरमियान किसी ने कभी उन्हें बीच रास्ते में नहीं देखा!

जानकार बताते है कि महंत नारायण दास को 94 वर्ष की आयु में जब वृद्धावस्था के कारण भिटौरा जाकर गंगाजल लाने में असुविधा होने लगी तो उन्होंने माता गंगा का आह्वाहन किया कि अब वे यही आ जाये, तब माता गंगा ने रात्रि में उनके स्वप्न में आकर कहा कि “बुला तो रहे हो बैठालोगे कहाँ” साथ ही तीन दिन और तीन रात का समय दिया कि अगर इस दौरान मंदिर परिसर में उनके रहने की व्यवस्था हो जाये तो वह उनके (नारायण दास के) कमंडल से होते हुए हमेशा हमेशा के लिये आ जायेंगी। क्योंकि समय कम था इसलिये उन्होंने अट्ठारह घण्टे तक ध्यानमग्न रहकर बाँकेबिहारी से मदद माँगी। बताते है कि कुछ ऐसा चमत्कार हुआ कि एक दिन और एक रात में ही मंदिर परिसर के दस बीघे भू-भाग में तालाब बनकर तैयार हो गया और फिर महंत नारायण दास ने भिटौरा जाकर गंगा जी को आमंत्रण दिया! 

कहते है माता गंगा महंत जी के कमंडल से होते हुए यहाँ पहुँची थी और तब से इस तालाब में बैठी है! मंदिर परिसर में स्थित इस अलौकिक तालाब का जल कभी समाप्त नहीं हुआ। इस तालाब को “तीज तालाब” के नाम से भी जाना जाता है। अपने पति की लम्बी आयु के लिये तीजा का वृत रखने वाली सुहागिने अगले दिन सुबह इस तालाब में गौरा-पार्वती की मूर्तियाँ विसर्जित करने के बाद अपना व्रत समाप्त करती है। इस दिन यहाँ बड़ा मेला भी लगता है। 

   बताते चले कि 1771 में नानक प्रसाद श्रीवास्तव का निधन के बाद लगभग पौने दो सौ वर्ष बाद उनके परपोते प्रदीप राय जो उस समय दिल्ली कैडर के आईएएस थे, उन्होंने अपनी माँ भानुमती देवी से इस मंदिर के बारे में सुनकर यहां आये और इतना प्रभावित हुए कि ग्यारह दिनो तक यही रहे। बाद में उन्होंने स्वयं इस मंदिर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, माता जानकी और लक्ष्मण की अष्टधातु की मूर्तियाँ भी स्थापित करवाई। इन मूर्तियों की स्थापना में स्थानीय कुछ व्यापारी खासकर चैक के रस्तोगी समाज का भी महत्वपूर्ण योगदान रहने का हवाला मिलता है। इस पौराणिक स्थान पर अंग्रेजी अफसर भी माथा टेकने आते थे।

बताया जाता है कि अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण हालत में श्रीश्री 108 महंत नारायणदास जी महाराज ने 1866 में 111 वर्ष की आयु में यही पर जीवित समाधि ली थी। इसके बाद उनके शिष्य राम कुमार दास इस सिद्धपीठ के महंत हुए, जिनके परपोते लक्ष्मण स्वरुप बनारस व मध्य प्रदेश विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर थे। वे गोलघमकटवा (बनारस) के निवासी थे, जो 1951 तक यहाँ के महंत रहे। उनके बाद उनके शिष्य गणेश दास जी महाराज यहाँ के महंत बने, जिन्होंने 1994 में एक पूर्व विधायक द्वारा बन्दूक की नोक पर एक बीघा तीन बिस्वा के करीब मंदिर की जमीन का उनसे बैनामा करा लेने से क्षुब्ध होकर श्राप दे दिया और मंदिर की सम्पूर्ण सम्पत्ति सरकार को सौंपने की घोषणा कर दी और 25 अप्रैल 1995 को तत्कालीन जिला अधिकारी डा० प्रभात कुमार को ट्रस्ट डीड करके मंदिर की समूची चल व अचल सम्पत्ति सरकार को सौंप दी। इस सिद्धपीठ के अंतिम महंत गणेश दास जी महाराज की 2005 में मौत के बाद मन्दिर का समूचा भू-भाग और सम्पत्ति विशुद्ध रूप से सरकार की सम्पत्ति हो गई है, जिसकी देखरेख का जिम्मा जिलाधिकारी के नेतृत्व (अध्यक्षता) वाली समिति करती है। इस समिति का पदेन मैनेजर तहसीलदार सदर होता है। 


’तीन धन्नियो की अजब कहानी’

महंत नारायणदास कुटी बाँके बिहारी मंदिर का एक वाकया लम्बे समय तक चर्चा में रहा। ये उन दिनो की बात है जब शिष्यों और भक्तों के लिये मंदिर परिसर में अतिरिक्त कमरों का निर्माण हो रहा था। कही से 54 धन्निया पाटने के लिये मँगाई गई थी जिनमें तीन छोटी पड़ गई जिससे काम रुक गया। बात महंत नारायण दास तक पहुँची तो वे उस स्थान पर पहुँचे और तीनो धन्नियो से कहा कि “ऐसा न करो कि तुम थोड़ा बड़ी हो जाओ”, कहते है धन्नियो ने महंत जी का आदेश मान लिया और जब काम कर रहे लोगों ने धन्नियो को बयालो मे रखा तो वह भी अन्य धन्नियो के बराबर मिली। इस चमत्कार को देखने जनपद की ख्याति लब्ध हस्ती जोधा सिंह अटैया भी आये थे और महंत जी से आशीर्वाद लिया। बाद में 1857 की गदर में जोधा सिंह अटैया अपने साथियों के साथ भी कुछ समय के लिये यहाँ शरण ली थी। पिछले दिनो जब पुनरोद्धार के लिये इस मंदिर का पुराना भवन ढहाया गया तो मंदिर का एक तथाकथित सर्वराकार अन्य सामान के साथ सारी धन्निया भी उठा ले गया, जिनमे उन तीनो के भी होने की बात कही जाती है!


’और 07 घण्टे हवा में टँगी रही इमली की टूटी डाल’

महंत नारायणदास कुटी का एक और वाकया लम्बे समय तक चर्चा में रहा। बताते है कि महंत नारायण दास प्रत्येक वर्ष मंदिर में भव्य रामलीला का मंचन करवाते थे। 1790 में मंदिर परिसर में रामलीला चल रही थी। जैसे ही परशुराम-लक्ष्मण संवाद शुरू हुआ आँधी-तूफान ने आयोजन में खलल डाली। कुछ देर बाद जब तूफान थमा तो मंचन फिर से शुरू हुआ। जहाँ पर मंचन हो रहा था वहाँ एक पुराना इमली का पेड़ था। महंत जी ने देखा की पेड़ की एक बड़ी डाल फटकर नीचे गिर रही है। उन्होंने डाल को हवा में ही रोक दिया और जब रामलीला समाप्त हो गई तब ही वह डाल नीचे गिरी।


’06 रंग बदलता है नार्मदेश्वर मंदिर का शिवलिंग’ 

बाँके बिहारी मंदिर की स्थापना के समय रहीस बाबू नानक प्रसाद श्रीवास्तव ने इसी मंदिर परिसर में बाबा नार्मदेश्वर मंदिर की भी स्थापना की थी और यहाँ पर स्थापित “नार्मदेश्वर शिवलिंग” की चर्चाए दूर-दूर तक आज भी होती है। कहते है इस शिवलिंग में रुद्राभिषेक गंगाजल और गन्ने के रस से करने पर यह अलौकिक शिवलिंग छः रंग बदलता है। खासकर श्रावण मास में यहाँ रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है। 


’खतरे से खाली नहीं है मंदिर में जोड़े के साथ रात्रि प्रवास’

जानकार बताते है कि महंत नारायणदास ने एक घटना से क्षुब्ध होकर पति-पत्नी को भी रात्रि समय मंदिर परिसर में प्रवास (रुकने) पर रोक लगा दी थी। महंत द्वारा जोड़े के रुकने पर प्रतिबंध लगाये जाने के बाद कुछ दशक पहले तक यहाँ जोड़ो का रुकना पाप माना जाता था किंतु जैसे-जैसे सोच बदली जोड़े रुकने तो लगे किंतु हमेशा अनहोनी की संभावनायें बनी रही।


’बड़ी अजब है बाँकेबिहारी की बांई भुजा का रहस्य’

इस अलौकिक मंदिर से जुड़ी एक और प्राचीन कहानी काफी चर्चित है। कहते है कि एक बार चोर मंदिर के अंदर से बाँके बिहारी की अष्टधातु की मूर्ति चुरा ले गये। सुबह जब नारायण दास को उनके आराध्य देव की मूर्ति के चोरी होने की खबर लगी तो गम में उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया। सत्रह दिनो तक चोर मूर्ति लेकर इधर उधर घूमते रहे। यहाँ तक कि मूर्ति की बांई भुजा भी काट डाली। फिर भी किसी भी स्वर्णकार ने मूर्ति को हाथ तक नहीं लगाया। थक-हारकर चोर मूर्ति व कटी भुजा को मंदिर परिसर में बने तीज तालाब में फेंककर भाग गये। तब महंत जी को स्वप्न आया कि तुम सो रहे हो और मै तालाब में दस कदम उत्तर दिशा में पड़ा हूँ। महंत जी कड़ाके की सर्द रात में उठे और स्वप्न में बताये स्थान पर मूर्ति मिली किंतु मूर्ति की भुजा कटी देखकर अत्यंत दुखी हुए और इसका गुनहगार अपने को मानते हुए देह त्यागने का मन बनाने लगे। कहते हैं कि अगली रात उन्हें फिर स्वप्न आया कि तालाब में दस कदम दक्षिण की ओर मेरी भुजा पड़ी है। तब उन्हें कटी हुई भुजा भी मिल गई। बाद में महंत जी के अनुरोध पर गंगा स्वर्णकार ने ईश्वर की प्रेरणा से बाँके बिहारी की मूर्ति से कटी हुई भुजा जोड़ी। मूर्ति की जुड़ी हुई भुजा आज भी स्पष्ट देखी जा सकती है।


“रहस्योे के घेरे में त्रिस्तरीय संरक्षक व संचालन समिति को गोपनीय रखना”  

फतेहपुर में अपनी तैनाती के दौरान डीएम आँजनेय कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी जिसमें त्रिस्तरीय व्यवस्था के तहत इस मंदिर को आकर्षक स्वरुप देने के साथ ही इसे बतौर आध्यात्मिक स्थल के साथ-साथ पर्यटक स्थल बनाने की भी रणनीति को अंतिम रूप दिया गया था। इसमें “महंत नारायण दास कुटी बाँकेबिहारी विराजमान मंदिर” के रखरखाव व अन्य व्यवस्था हेतु संरक्षक मंडल का गठन किया गया जिसमें जिला अधिकारी समेत पुलिस कप्तान, अपर जिला अधिकारी, अपर पुलिस अधीक्षक को शामिल किया। इसके अतिरिक्त प्रबन्ध समिति बनायी गयी जिसमें उप जिलाधिकारी, तहसीलदार, उप पुलिस अधीक्षक, अधिशासी अधिकारी नगर पालिका परिषद को सम्मिलित किया गया। इसके अतिरिक्त मंदिर की व्यवस्था के लिये जनप्रतिनिधियो की भी एक समिति बनाई गई जिसमें सांसद, सदर विधायक, नगर पालिका चेयरमैन और व्यापार मंडलो के अध्यक्ष शामिल किये गये। इससे पहले कि ये तीनो समितियों की सूची सार्वजनिक होती डीएम आँजनेय का यहाँ से तबादला हो गया, जिसके बाद यह सूची डीएम के स्टेनो लल्लू राम तक सीमित रही। इन समितियों की सूची अब तक सार्वजनिक न होने से जहाँ अभी भी भ्रम की स्थिति बनी हुई है, वही कुछ बाहरी तत्व व्यवस्था को प्रभावित भी करने लगे है, जिससे मंदिर और प्रशासन की ओर भी उँगलियाँ उठना लाजिमी है! कुछ दिन पूर्व मंदिर परिसर में लगाये गये कुछ शिलापट्टोको लेकर भी तरह तरह की चर्चाएँ हो रही है।


’सरकारी दस्तावेजो में कहाँ है मंदिर और क्या है नाम’

बाँके बिहारी विराजमान मंदिर की 14 बीघे 07 बिस्वा जमीन जो मौके पर लगभग 11 बीघे ही बची है। वह सरकारी दस्तावेजो में उत्तरी कस्बा फतेहपुर (शहर का ज्वालागंज इलाका) में दर्ज है, जिसके लगभग चार बीघे में अभी भी अवैध कब्जा है। यहाँ तक कि अति प्राचीन कुँआ किसी के घर के अंदर पहुँच गया है। इस मंदिर का वास्तविक दस्तावेजी नाम श्रीबिहारी जी महाराज विराजमान मंदिर नारायण दास कुटी है।

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