संत साहित्य पढ़ने से हिंदी की समझ बनेगी: प्रोफेसर नंदकिशोर पांडेय

 संत साहित्य पढ़ने से हिंदी की समझ बनेगी: प्रोफेसर नंदकिशोर पांडेय



भारतीय साहित्य का भक्तिकाल करीब चार सौ वर्षों का है। हिंदी को समझने के लिए उस काल में लिखे संत साहित्य को पढ़ना होगा। संत साहित्य की समझ के साथ-साथ हिंदी की भी समझ विकसित होगी और हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का गौरव समझ आएगा


राजस्थान विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर नंदकिशोर पांडेय


न्यूज़। भारतीय साहित्य का भक्तिकाल करीब चार सौ वर्षों का है। हिंदी को समझने के लिए उस काल में लिखे संत साहित्य को पढ़ना होगा। संत साहित्य की समझ के साथ-साथ हिंदी की भी समझ विकसित होगी और हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का गौरव समझ आएगा। हमारे संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी और भारतीय भाषाओं के जुड़ाव का उल्लेख है। उसके अनुसार हिंदी को भारतीय भाषाओं के साथ जोड़कर काम हुआ है। लेकिन उस काम पर आश्वस्ति और संतोष व्यक्त नहीं किया जा सकता है।

स्वाधीनता के बाद जितना काम इस क्षेत्र में होना चाहिए था उतना नहीं हो पाया। भारतीय भाषाओं की शब्दावली हिंदी में स्वीकृत नहीं हैं। अंग्रेजी को तो हमने स्वीकार किया लेकिन भारतीय भाषाओं से शब्द लेने का काम नहीं हो पाया। ऐसा न होने की वजह से हिंदी की स्वीकार्यता बढ़ने में बाधा उत्पन्न हुई। ये कहना है केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के पूर्व निदेशक और राजस्थान विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर नंदकिशोर पांडेय का जो हिंदी उत्सव में जागरण ज्ञानवृत्ति के शोधार्थी निर्मल पांडेय से ‘हिंदी और भारतीय भाषाओं का साहचर्य’ विषय पर बात कर रहे थे।

‘हिंदी हैं हम’ के हिंदी उत्सव में बोले राजस्थान विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर नंद किशोर पांडेय

प्रो पांडेय ने बताया कि एक तेलुगु भाषी मोटुरी सत्यनारायण ने न केवल केंद्रीय हिंदी संस्थान की स्थापना की बल्कि दक्षिण भारत में भी गांधी जी की प्रेरणा से हिंदी का दायरा बढ़ाने का काम किया। पहले वो दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के साथ जुड़े रहे फिर वर्धा में रहकर हिंदी के लिए काम किया। हिंदी को समृद्ध करने के लिए बारतीय भाषाओं के साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। आपको बताते चलें कि अपनी भाषा को समृद्ध और मजबूत करने के लिए दैनिक जागरण का उपक्रम ‘हिंदी हैं हम’ के अंतर्गत हिंदी दिवस के मौके पर एक पखवाड़े का हिंदी उत्सव मनाया जा रहा है। इसमें फिल्म, पत्रकारिता, शिक्षा, समाजशास्त्र, साहित्य आदि क्षेत्रों के विशेषज्ञों से हर दिन बातचीत की जाती है।

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