माता विंध्यवासिनी की आलौकिक छटा से समूचा क्षेत्र ही नहीं दूर दराज के लोग भी खिचे चले आते है

 माता विंध्यवासिनी की आलौकिक छटा से समूचा क्षेत्र ही नहीं दूर दराज के लोग भी खिचे चले आते है



संवाददाता बाँदा।भारत देश में सैकड़ों मंदिर है, जिनमें अलग-अलग विशेषता है और श्रद्धालुओं की श्रद्धा भी इन मंदिरों पर रहती है। ऐसा ही एक मंदिर बांदा जनपद के गिरवां स्थित का जिसे हम खत्री पहाड़ के नाम से जानते है। इस मंदिर में विराजी मां विंध्यवासिनी की आलौकिक छटा से समूचा क्षेत्र ही नहीं दूर दराज के लोग भी खिचे चले आते है, सफेद पहाड़ में विराजी मां की छटा ही अलौकिक नहीं है बल्कि इनके यहां विराजमान होने की कथा भी दिव्य है।बता दें कि बांदा जनपद से 20 किलोमीटर की दूरी पर गिरवां क्षेत्र में एक मंदिर बना है जिसमें मां विंध्यवासिनी पहाड़ों पर विराजमान है, इस मंदिर का निर्माण 17 सितंबर 1974 को हुआ था। इस मंदिर में मंदिर स्थान पर जाने के लिए श्रद्धालुओं को 511 सीढ़ियों का सफर तय करना पड़ता है। इस मंदिर में हर साल नवरात्र नवमी को विशाल मेला लगता है जिसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालू दूर-दूर से आते है। कहते है कि इस मंदिर में लोगों की मनोकामना पूरी होती है, लोगों की श्रद्धा से अपने आप में मिसाल है। इस मंदिर में मां विंध्यवासिनी के दर्शन करते है मरीजों के रोग तक ठीक हो जाते है। खत्री-पहाड़ में मंदिर नीचे बना है व इसके बाद 511 सीढ़ी चढ़ने के बाद जब आप ऊपर जायेगे तब वहां पर पहाड़ का वो फटा हुआ हिस्सा भी मिलेगा जो की मां विन्ध्वासिनी के क्रोध का शिकार हुआ था, ऊपर भी एम मंदिर बना हुआ है। इस मंदिर में हर साल नवरात्र की अष्टमी को मंदिर का पट बंद रहता है, क्योंकि हर वर्ष इसी दिन मां विंध्यवासिनी इस स्थान पर आती है व विराजमान होती है।

गिरवां क्षेत्र के लोग बताते है कि देवी का आगमन द्वापर युग से जुड़ा हुआ है, जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के रूप में कन्या सौपी गई और जैसे ही कन्या को मारने के लिए कंस ने हवा में उछाला वैसे ही कन्या के रूप में देव माया आकाश में उड़ गई और कंस की मृत्यु की भविष्यवाणी करते हुए वहां से चल कर विध्याचल पर्वत में आ गईं, लेकिन किन्ही कारण वश उन्हे विन्ध्याचल मिर्जापुर के स्थान को छोड़ना पड़ा, मां विध्यवासिनी जब गिरवां खत्री पहाड़ आई तो पर्वत ने उनका भार न सहन कर पाने की बात कही, जिस पर देवी ने क्रोध में पर्वत को कोढी होने का श्राप दे दिया, जब पर्वत ने क्षमा मांगी तो देवी ने कहा कि वह नवदुर्गों की अष्टमी को एक दिन के लिए पर्वत पर आती हैं, यहीं कारण है कि अष्टमी के दिन पहाड़ के नीचे के मंदिर के पट बंद रहते है, मंदिर निर्माण को लेकर भी बड़ी ही रोचक कथा प्रचलन में है, कन्या पर सवार होकर गांव वालों से मंदिर निर्माण की बात कही, जिस पर गांव वालों ने मंदिर निर्माण कराया, गांव वाले बताते है कि देवी की मूर्ती को देखने से एक दिव्य प्रकाश की अनुभूति होती है, कई तरह के रोगी यहां आकर ठीक हो जाते है, आस पास के क्षेत्र के शादी शुदा जोड़े सबसे पहले यहीं आते है,मां विंध्यवासिनी अपने शांत रूप में यहां विद्यमान है।

मंदिर के पुजारी ने बताया की इस मंदिर के पहाड़ को श्रापित इसलिए कहा जाता है क्योंकि जब कस ने योग माया का पैर पटक कर मारना चाहा था वो भगवती यहां पर आई थी, जब यह पहाड़ इनका भार नहीं सह पाया था तो मां भगवती ने पहाड़ को श्राप दे दिया था की जा तू कोढ़ी हो जा। इसके बाद यह देवी यहां से विंध्याचल चली गयी थी जिसके बाद वहां जाकर इनका नाम विंध्यवासिनी पड़ा। बताया कि इस पहाड़ को खत्री पहाड़ इसलिए कहा जाता है क्योंकि मुग़ल शासन काल में कुछ लोगों को फांसी की सजा हो गयी थी तब इसके बाद खत्री जात के लोगों ने इसका निर्माण करवाया।इसके बाद 17 सितंबर 1974 में इस मंदिर का निर्माण हुआ। क्योंकि उस समय विंध्याचल में विंध्याचल के पंडितों के द्वारा के मिलिट्री मैन की पत्नी की हत्या हो गयी थी और उस मिलिट्री मैन ने अपनी पत्नी की हत्या के बाद जोश में जाकर मूरत पर गोली दाग दी थी, तब उस समय सीएम के आदेश पर शासन ने कमला पात्र बांटी थी, बांदा में डीएम हरगोविंद विश्नोई व एसपी मेहरबान सिंह थे वो काफी तामझाम के साथ इस मेले को रोकने के लिए यहां पर आये, तब यहां के पुजारियों ने उनको नौरात्र की विशेषता बताते हुए 9 नारियल फोड़े व पुजारी ने बताया कि उनका लड़का आंखों से देख नहीं सकता था।इस मंदिर में आने के बाद उसकी आंखों में रौशनी आ गयी, वो देखने लगा। इसके बाद डीएम व एसपी ने जाकर शासन को अपनी रिपोर्ट भेजी व तभी से यहां पर हर साल नौरात्र में 10 दिन मेला लगता है जिसमे नवमी के दिन विशाल मेले का आयोजन होता हैं जिसमे पुलिस द्वारा बड़ी तादात में पुलिस बल को भी सुरछा की दृष्टि से यहां लगाया जाता है।

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