शिवराजपुर में मीरा के आराध्य गिरधर गोपाल

 शिवराजपुर में मीरा के आराध्य गिरधर गोपाल



कार्तिक पूर्णिमा को लगेगा मेला


 गंगा स्नान, गिरधर गोपाल के दर्शन आएंगे श्रद्धाल


बिदकी फतेहपुर।गंगा के तट पर मोहन की बावरी मीरा ने अपने प्यारे कन्हैया की मूर्ति स्थापित की थी । फतेहपुर जनपद के जहानाबाद विधानसभा के मलवां ब्लाक के शिवराजपुर जिसे पुराणों में आदिकाशी की संज्ञा दी गई है, कृष्ण भक्ति रस में लीन मीरा बहुत दिनों तक रुकी थी ।अपने साथ लिए हुए गिरधर गोपाल की मूर्ति को उन्होंने रख दिया था । जब मीरा यहाँ से जाने लगी तो उन्होंने मूर्ति को साथ ले जाने का प्रयास किया ।लेकिन जब मूर्ति अपने स्थान से नहीं उठी तो मीरा ने गंगा के इस तट पर गिरधर गोपाल की मूर्ति स्थापित कर कृष्ण - गान करते हुए चली गयी । गिरधर गोपाल का इस स्थान पर विशाल मन्दिर बना है। देश के कुछ शोधार्थी इस मूर्ति व स्थान पर शोध कर रहे हैं । प्रति वर्ष यहाँ सात दिनों तक चलने वाला मेला लगता है ।


*सती प्रथा का विरोध कर भक्ति रस में लीन हुई मीरा*

 

मीराबाई का जन्म संवत 1504 में राजस्थान के पाली में कुडकी गांव में हूं रत्न सिंह के घर हुआ था। बचपन से ही कृष्ण भजन में मीरा की रूचि थी ।मीरा का विवाह उदयपुर के महाराणा भोजराज के साथ हुआ था। कुछ समय बाद पति की मृत्यु के बाद सती प्रथा का विरोध कर साधु संतों की संगत में हरिकीर्तन करते हुए विचरण को निकल पड़ी ।संत रविदास को अपना गुरु चुना ।कई बार मीराबाई को जहर देकर मारने की भी चेष्टा की गई। विचरण करते हुए मीराबाई ने शिवराजपुर आदि काशी को तपस्थली के रूप में चयन किया। संवत 1558  में मीराबाई परलोक सिधार गई।


*सात पीढ़ियों से एक ही परिवार कर रहा पूजा*


मीराबाई के गिरधर गोपाल को शिवराजपुर में स्थापित करने के बाद भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। जिसकी पूजा में एक ही परिवार समर्पित रहा। सातवीं पीढ़ी में हरि ओम दीक्षित पूजा व्यवस्था देख रहे हैं। नियम के बंधनों का अनुपालन करते हुए आज भी परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत पूजा करने वाला व्यक्ति परिवार के कार्यक्रमों में शरीक नहीं होता है। घर में शुद्धता तक प्रवेश नहीं करेगा ।मंदिर में ही रहकर भगवान की सेवा करेगा।


*खुद प्रसाद लेने पहुंचे थे श्री कृष्ण*


मंदिर के पुजारी हरिओम दीक्षित  ने  बताया कि जब बाबा पुजारी थे तो उस समय बाबा व उनके भाई के बीच विवाद हो गया। इस पर दो में से किसी ने भी गिरधर गोपाल जी को भोग नहीं लगाया। तब मंदिर में रखा चांदी का कटोरा लेकर बालक रूप बना गिरधर गोपाल जी  लाला हलवाई के यहां से भोग का प्रसाद लाए। हलवाई मंदिर आए और कटोरा दिखाकर पूरी घटना बताई ।सभी को बहुत ही पश्चाताप हुआ था। तब से कभी ऐसा नहीं हुआ कि भगवान को भोग न लगा हो।


 

चित्तौड़ राज घराने से आता था पैसा


मंदिर के पुजारी हरिओम दीक्षित ने बताया कि मंदिर में प्रसाद के लिए चित्तौड़ राज घराने से खर्च आता था। यह खर्च आना अब बंद हो गया है। मंदिर के नाम रूरा में दस बीघे जमीन है। इसी से हुई आय पर प्रसाद व मंदिर की देखरेख का काम होता है। बताया कि विश्व में और कहीं भी अष्टभुजीय ऐसी अद्वतीय मूर्ति गिरधर गोपाल जी की नहीं है।कार्तिक भर लोग जब भी गंगा स्नान को आते है

तो यहां आकर गिरधर गोपाल जी के दर्शन कर अपने को धन्य मानते हैं।

ग्राम प्रधान प्रतिनिधि सूर्यपाल यादव ने बताया कि कोरोना के चलते पिछले साल मेला नहीं लग पाया था ।इस बार मेला लगने का   आदेश प्रशासन द्वारा मिलगया है। 19 नवंबर से 25 नवंबर तकभव्य रूप से पूर्व की भांति  मेला लगेगा।

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