"भावों का रिश्ता"

 "भावों का रिश्ता"


महसूस मुझे होता है जो, 

           उन भावों को ही लिखती हूँ। 

बन करके साधिका सदा, 

            साहित्य साधना ही करती हूँ। 

जहाँ बोध अपराध का होता, 

           वहाँ नहीं पल भर रहती हूँ। 

सीधा साधा जीवन मेरा, 

           सात्विकता ही संग रखती हूँ।

स्पर्धा न किसी से रखती, 

            स्पर्धा ख़ुद से करती हूँ । 

मैं मेंरी कल्पित दुनिया में, 

          तनहा ही विचरण करती हूँ। 

होकर स्नेहिल स्नेह जो करते, 

          आदर उनका सदा मैं करती। 

मुझसे हैं जो द्वेष भी करते, 

           उनको भी मैं स्नेह ही देती। 

वसुंधरा संग ह्रदय जुड़ा है, 

             नयन सदा अम्बर में रखती। 

चहुँ ओर जो प्रकृति घिरी है, 

               वो संग ह्रदय में रखती हूँ। 

महसूस मुझे होता है जो, 

              उन भावों को ही लिखती हूँ। 

रश्मि पाण्डेय

बिन्दकी, फतेहपुर

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