ऐतिहासिक खजुहा मेला 15अक्टूबर को होगा संपन्न

 ऐतिहासिक खजुहा  मेला 15अक्टूबर को होगा संपन्न



राम-रावण युद्ध में नहीं जलाया जाता रावण का पुतला


14अक्टूबर को निकाली जाएगी  भव्य शोभायात्रा


रिपोर्ट आर डी दोसर 


खजुहा(फतेहपुर)। प्रदेश के जनपद फतेहपुर में प्रसिद्ध ऐतिहासिक नगरी खजुहा कस्बे का ऐतिहासिक मेला वैसे तो विजयादशमी के दिन से गणेश पूजन के पश्चात शुरू हो जाता है जिसका विधि विधान से यहां मेला का शुभारंभ एवं समापन होता है। यहां पर आगामी 14 अक्टूबर  को शोभायात्रा निकाली जाएगी और 15अक्टूबर  को राम- रावण के बीच घमासान युद्ध छिड़ेगा। यहां की रामलीला एवं मेला 527 वर्ष पुरानी परंपरा के मुताबिक आज भी होता चला आ रहा है। यह रामनगर बनारस के सामान पूरे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। जो भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया तीजा से प्रारंभ होकर कार्तिक पक्ष की सप्तमी से समाप्त होता है। एक माह तक कुशल कारीगरों द्वारा काठ एवं नरही  (एक ख़ास प्रकार की घास ) आदि से विशालकाय रावण एवं रामदल स्वरूपों का निर्माण किया जाता है। विजयादशमी से 10 दिनों तक चलने वाला यह मेला विभिन्न कल्पित स्थानों जैसे पंचवटी चित्रकूट, शबरी आश्रम, किष्किंधा पर्वत, अशोक वाटिका और रामसेतु बांध, रामेश्वर तथा लंका से समाप्त होता है।

यहां शोभायात्रा के दिन रावण की विधि विधान से श्री राम जानकी पंचायती मंदिर के पुजारी एवं मंदिर के प्रबंधक आदि द्वारा हजारा आरती करवाया जाता हैं।यह पुरानी परंपरा आज भी चली आ रही है। जिस दिन से मेले की गणेश पूजन के साथ शुरुआत होती है मंदिर के पुजारी व्रत रखते हैं और रावण वध के पश्चात सरजू स्नान के साथ रावण की तेरहवीं मे ब्रह्मभोज भी कराया जाता है। परंतु अब कुछ प्रशासन जागा है और जिसके कारण इस कस्बे को पर्यटक स्थल घोषित किया गया है।

 बिंदकी तहसील से लगभग 6 किलोमीटर दूर पश्चिम दिशा पर मुगल मार्ग से आगरा मार्ग पर स्थित खजुहा कस्बे में दो विशालकाय फाटक व सराय आज भी इसकी बुलंदियां बयां करती हैं। मुगल रोड के उत्तर में  दो राम जानकी मंदिर तथा तीन विशालकाय शिवालय हैं। दक्षिण में छिनमस्तिष्क मां पनथेेश्वरी देवी का प्राचीन मंदिर व बंसीवाला मठ भूरा बाबा की समाधि स्थल है। बड़ी बाजार में तीन राधा कृष्ण मंदिर हैं और इस प्राचीन सांस्कृतिक नगरी में 121 छोटे-बड़े शिवालय मंदिर तथा इतने ही कुएं हैं। चार विशालकाय तालाब इस नगरी के चारों दिशाओं में शोभायमान हैं। जो इस नगर के स्वर्णिम युग की याद दिलाते हैं। गौरतलब रहे कि तांबे का यह रावण का सिर पहले तो मंदिर के चबूतरे पर ही रखा रहता था कई बार चोरों ने उसे ले जाने की योजना बनाई परंतु सिर को टस से मस नहीं कर सके। मुगल शासन काल से लगने वाले इस मेले में रावण के रथ का वजन लगभग 70 कुंतल का होता है जो 30 फुट की ऊंचाई में बनी लंका में रस्सो के जरिए लगभग आधा सैकड़ा लोग चढ़ाते हैं। शोभायात्रा के उपरांत रावण की हजारादीप वाले हजारा आरती होती है इस दिन मुगल मार्ग जाम रहता है मेला ग्राउंड में चारों ओर बड़े-बड़े टीले बने हुए हैं और दर्शक वहीं से बैठकर मेला का लुफ्त उठाते रहते हैं। विशेष यह कि यहां पर युद्ध समाप्ति के बाद कभी भी रावण को जलाया नहीं जाता है। इस मेले का विशेष महत्व होता है जो कि इतिहास के पन्नों में इसका प्रमाण दर्ज है।

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